पिता के कारण जीवन भर दुःख झेलती रहीं द्रौपदी, जानिए कारण
यज्ञ से निकली याज्ञसेनी थी वो, अतीव सुंदरी !अद्भुत थी वो।
पितृ अपमान का प्रतिशोध लेने जन्मी थी वो, द्रुपद दुहिता, कृष्णा थी वो।।
महाभारत की कथा में द्रौपदी एक ऐसी नारी हैं, जिसका जीवन जीवन संघर्ष, साहस और आत्मसम्मान से भरा हुआ है। उन्हें याज्ञसेनी, कृष्णा और पांचाली भी कहा जाता है। द्रौपदी राजा द्रुपद की पुत्री थीं और पांडवों की पत्नी के रूप में प्रसिद्ध हुईं। उनका जन्म सामान्य नहीं, बल्कि एक यज्ञ की अग्नि से हुआ था।

राजा द्रुपद और गुरु द्रोणाचार्य कभी मित्र थे, लेकिन समय के साथ उनके संबंध बिगड़ गए। द्रोणाचार्य को राजा द्रुपद से अपने अपमान का बदला लेना था। जब पांडवों और कौरवों की शिक्षा पूरी हुई, तो द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा में द्रुपद को बंदी बनाकर लाने को कहा। अर्जुन ने युद्ध में द्रुपद को पराजित किया और उन्हें द्रोणाचार्य के सामने प्रस्तुत किया। साथ ही द्रुपद का आधा राज्य भी छिन गया। इस अपमान ने द्रुपद के मन में गहरा दुख और क्रोध भर दिया। अपने अपमान का बदला लेने के लिए राजा द्रुपद ने एक विशाल यज्ञ कराया। वे एक ऐसे पुत्र की कामना कर रहे थे, जो द्रोणाचार्य का वध कर सके। यज्ञ से पहले धृष्टद्युम्न का जन्म हुआ, जिसे द्रोणाचार्य का वध करने के लिए ही जन्मा गया था। लेकिन इसी यज्ञ से एक कन्या का भी जन्म होने वाला था, जिसे द्रुपद नहीं चाहते थे।
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कहा जाता है कि क्रोध में आकर राजा द्रुपद ने देवताओं से अपनी पुत्री के लिए सुख नहीं, बल्कि कष्ट मांगे। यज्ञ में आहुति देते समय वे कहते गए कि उसकी आत्मा पवित्र हो, लेकिन उसे संसार के सारे अपमान सहने पड़ें। उसमें शक्ति हो, लेकिन जीवन उसे बार-बार कमजोर करने वाली परिस्थितियों में डाले। वह सुंदर हो, लेकिन सबसे अधिक पीड़ा भी उसी को मिले। अन्याय उसके साथ हो, फिर भी वह न्याय का मार्ग न छोड़े। किसी ने सही ही कहा है, मां- बाप की दुआ और बदुआ दोनों पर भगवान् कहता है तथास्तु। इसीके परिणामस्वरूप यज्ञ की अग्नि से द्रौपदी का जन्म हुआ।

बाद में वही कन्या राजा द्रुपद की सबसे प्रिय संतान बन गई। द्रौपदी का जीवन कठिनाइयों से भरा रहा। चीरहरण, वनवास और बार-बार अपमान ने उनके जीवन को पीड़ा से भर दिया। लेकिन हर कठिन समय में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को स्मरण किया और साहस के साथ अन्याय का सामना किया। द्रौपदी के अपमान ने ही महाभारत के युद्ध की नींव रखी। अंततः उसी अपमान का प्रतिशोध युद्ध में लिया गया और पांडवों की विजय हुई। द्रौपदी आज भी नारी सम्मान, धैर्य और न्याय की प्रतीक मानी जाती हैं।