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समीक्षा का दिखावा करने से ज्यादा जरूरी..., रोहिणी ने सोशल मीडिया पर दी नसीहत...

Was Tejashwi's review meeting just a show?

पटना: राजद सुप्रीमो लालू यादव की बेटी और सारण लोकसभा से पूर्व प्रत्याशी रोहिणी आचार्य ने बिहार विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद परिवार और पार्टी से दुरी जरुर बना ली है लेकिन वह तेजस्वी यादव पर लगातार तंज कसती हुई नजर आ ही जाती हैं। एक बार रोहिणी ने तेजस्वी की समीक्षा बैठक पर जबर्दस्त तंज कसा और उन्हें नसीहत भी दी है।

समीक्षा का दिखावा नहीं, आत्ममंथन की जरूरत

रोहिणी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर तेजस्वी यादव को समीक्षा करने को दिखावा बताया है साथ ही आत्म मंथन करने तथा जिम्मेदारी लेने की नसीहत दी है। उन्होंने इस पोस्ट में तेजस्वी यादव के सहयोगियों पर जबर्दस्त निशाना साधा है और अंत में लिख दी कि पब्लिक तो सब जानती और समझती है। अपने सोशल मीडिया पोस्ट में रोहिणी आचार्य ने लिखा है कि 'समीक्षा का दिखावा करने से ज्यादा जरूरी 'खुद' आत्म - मंथन ' करने और जिम्मेदारी लेने की है , 'अपने' इर्द - गिर्द कब्ज़ा जमाए बैठे चिन्हित 'गिद्धों' को ठिकाने लगाने का साहस दिखाने के बाद ही किसी भी प्रकार की समीक्षा की सार्थकता साबित होगी... बाकी तो ये जो पब्लिक है न , वो सब जानती - समझती ही है ..।'

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बता दें कि विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद सवाल करने पर रोहिणी आचार्य ने अपने भाई तेजस्वी के सामने उनके सहयोगियों के द्वारा दुर्व्यवहार किये जाने और चप्पल से मारने की धमकी दिए जाने का आरोप लगाया था। रोहिणी ने इसके बाद अचानक यह जानकारी देते हुए कि वह अब हमेशा के लिए परिवार और राजनीति से दूर रहेंगी, अपने माता पिता के घर से अपना सामान लेकर दिल्ली चली गई थी। हालांकि रोहिणी के इस कदम के बाद उनके समर्थन में भाई तेज प्रताप यादव जरुर आये थे लेकिन तेज प्रताप पहले ही पार्टी और परिवार से दूर हैं।

10 जनवरी को भी साधा था निशाना

इस मामले में अब तक लालू-राबड़ी के साथ ही तेजस्वी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। बता दें कि अभी बीते 10 जनवरी को भी रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पोस्ट कर तेजस्वी पर बड़ा निशाना साधा था। उन्होंने इस पोस्ट के जरिये अपने और बनावटी अपने में फर्क समझाने की कोशिश की थी और लिखा था कि 'बड़ी शिद्दत से बनायी और खड़ी की गयी "बड़ी विरासत" को तहस - नहस करने के लिए परायों की जरूरत नहीं होती, "अपने" और अपनों के चंद षड्यंत्रकारी "नए बने अपने" ही काफी होते हैं ..  हैरानी तो तब होती है , जब "जिसकी" वजह से पहचान होती है , जिसकी वजह से वजूद होता है , उस पहचान, उस वजूद के निशान को बहकावे में आ कर मिटाने और हटाने पर "अपने" ही आमादा हो जाते हैं ..  जब विवेक पर पर्दा पड़ जाता है, अहंकार सिर पर चढ़ जाता है .. तब "विनाशक" ही आँख - नाक और कान बन बुद्धि - विवेक हर लेता है ..।'

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