पटना: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा में निर्वाचित होने के बाद MLC पद से इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि अब वे बिहार के मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। सीएम के विधान परिषद से इस्तीफा देने के बाद उनके खासमखास मंत्री अशोक चौधरी भावुक हो उठे और रोने लगे। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने बिहार में विकास की जो लकीर खिंची है वह राजनीतिक सोच के लोगों में मुझे नहीं लगता है कि कोई और होगा। नीतीश कुमार ने न सिर्फ बिहार का विकास किया बल्कि इतने लंबे समय से पद पर रहने के बावजूद उनका कोई विरोधी नहीं था।

मंत्री अशोक चौधरी ने कहा कि वह अब हमारे मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे और सदन में भी उनका साथ नहीं रहेगा लेकिन वह हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे। सदन में रहते थे तो उनका डांटना फटकारना नहीं रहेगा। जवाब देते समय जब कोई मंत्री फंसता था तो वह संभालते थे। नीतीश कुमार के बिना सदन रहेगा तो निश्चित रूप से खलेगा। जब हमने भीम संसद कार्यक्रम किया था तो उन्होंने मानस पिता की उपाधि दी थी। मानस पिता तो उसी को कहते हैं जिन्हें आप आदर्श मानते हैं। हमारे पिता जी 14 में चले गए थे उसी वक्त हम MLC बने थे। हम उस समय एक बिल के खिलाफ जब बिहार में पैदल चले थे तो लोगों का प्यार देखा था नीतीश जी के प्रति तो हमने सोनिया गांधी से मुलाकात कर कहा था कि वह एक सर्वमान्य नेता हैं। 

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मंत्री अशोक चौधरी ने कहा कि पैदल यात्रा के दौरान हमने सभी लोगों से मुलाकात की थी और नीतीश जी के प्रति जो प्यार देखा था तो सोनिया गांधी को कहा था और फिर 2015 में महागठबंधन बना और हमें उनका सानिध्य भी मिला था। नीतीश जी ने मुझे काफी प्यार और सम्मान दिया था और यही वजह है कि हम उनके साथ चले आये। मैं हिंदुस्तान में अकेला नेता हूं जो दलित परिवार से आता हूँ और बिना किसी सदन के सदस्य रहते हुए 6 महिना तक मंत्री भी रहा। अन्य जातियों को देखेंगे तो ऐसा उदहारण मिल सकता है लेकिन दलित में मैं अकेला नेता हूँ। नीतीश जी हमेशा मेरे साथ मजबूती के साथ खड़ा रहे और हमेशा प्यार देते रहे और काम पर ध्यान देने के लिए कहते रहे। नीतीश जी ने मुझे एक पुत्र की तरह प्यार दिया।

मंत्री अशोक चौधरी ने कहा कि यह एक राजनीतिक निर्णय है और उनका खुद ही निर्णय है तो कुछ कह नहीं सकते हैं। वहीं जदयू कार्यकर्ताओं के द्वारा भाजपा पर दबाव बनाए जाने को लेकर कहा कि जब भी कोई बड़ा राजनीतिक निर्णय लिया जाता है तो नीतीश जी का अपना निर्णय होता है। उनकी खुद की इक्षा थी कि हम राज्यसभा जायें तो इसमें कोई दबाव की बात नहीं है। उनके जितने भी चाहने वाले हैं सभी आज दुखी होंगे और जब उन्होंने यह निर्णय लिया है तो कुछ अच्छा ही सोच कर लिया है।

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