महिलाओं की नौकरी पर पड़ सकता है असर, पीरियड लीव कानून पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
Supreme Court of India ने मासिक धर्म अवकाश (Menstrual Leave) को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि अगर इसे कानून के जरिए सभी संस्थानों में अनिवार्य कर दिया जाता है, तो इससे महिलाओं की नौकरियों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। कोर्ट ने आशंका जताई कि निजी क्षेत्र की कंपनियां अतिरिक्त खर्च और संभावित व्यवधान की वजह से महिलाओं को नौकरी देने में हिचकिचा सकती हैं। ऐसे में यह कदम महिलाओं के रोजगार के अवसरों को सीमित भी कर सकता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मासिक धर्म अवकाश का मुद्दा बेहद संवेदनशील और जटिल नीतिगत विषय है। इसलिए इस पर निर्णय लेना अदालत के बजाय सरकार और नीति-निर्माताओं के अधिकार क्षेत्र में आता है। हालांकि कोर्ट ने उन राज्यों और संस्थानों की सराहना की, जो स्वेच्छा से इस तरह की सुविधा उपलब्ध करा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर Bihar और Kerala में कुछ स्तरों पर महिलाओं को मासिक धर्म अवकाश की व्यवस्था दी गई है।
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न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि सभी जगहों के लिए एक समान नियम लागू करना हमेशा व्यावहारिक नहीं होता। ऐसा करने से महिलाओं को लेकर पारंपरिक लैंगिक धारणाएं और मजबूत हो सकती हैं, जिससे प्रतिस्पर्धी नौकरी बाजार में उनके करियर की प्रगति पर असर पड़ने की आशंका बनी रहती है।