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सहरसा के एक गांव में मृत्यु भोज के बहिष्कार का फैसला, जानें वजह..

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Saharsa :-खबर सहरसा जिले से हैं। जहां एक गांव के लोगों ने मृत्यु भोज को लेकर बड़ा फैसला किया है. इसे मृतक के परिवार के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान करने वाला बताते हुए इसे खत्म करने का फैसला किया है, हालांकि इस फैसले को लेकर पक्ष और विपक्ष में अपने-अपने तर्क दिए जा रहे हैं.

मामला सहरसा जिला के पतरघट प्रखंड अंतर्गत किशनपुर पंचायत से जुड़ा है. यहां के वार्ड 9 और 10 के स्थानीय लोगों और शिक्षकों ने शिव मंदिर में विशेष बैठक की, जिसमें ग्रामीणों ने एक साथ मृत्यु भोज के बहिष्कार का फैसला किया। राजेंद्र यादव उर्फ राजा 

 यादव ने कहा कि मृत्यु भोज से कई प्रकार का हानि पहुंचता  है. मृतक के परिवार को मानसिक और आर्थिक रूप से परेशानी झेलनी पड़ती है.हमारे संविधान एवं ग्रंथ में नहीं लिखा गया है कि मृत्यु भोज करना जरूरी है.  वहीं रविंद्र चरण मंडल ने कहा कि कमजोर तपके के  समाज में रूपए पैसे नहीं रहने पर लोगों से कर्ज लेकर भोज में लगाते हैं, और आगे कई सालों तक उसे कर्ज को चुकाने में परिवार परेशान रहता है. इसलिए हमलोग  मृत्यु भोज नहीं करने  हम संकल्प लिए हैं। आने वाले दिनों में यह फैसला समाज का मार्गदर्शन करेगा।मृत्यु भोज समाज के लिए अभिशाप है,जो परंपरा के रूप में दीमक की भांति समाज को खोखला करता जा रहा है। इस कुरीति को जड़ से मिटाने के लिए हमलोग कृत संकल्पित हैं।

 विजेंद्र प्रसाद मंडल एवं राजेंद्र  यादव उर्फ राजा यादव ने कहा कि मृत्यु भोज के बहिष्कार का समाज के लोगों पर कुछ असर देखने को मिल रहा है। इस तरह के निर्णय से समाज में समरसता बढ़ेगी। लोगों को आर्थिक क्षति से भी मुक्ति मिलेगी। मौके पर मौजूद राजेंद्र यादव उर्फ राजा यादव, रविंद्र  चरण मंडल, वार्ड सदस्य अभिनंदन यादव, सजन यादव, सिंटू कुमार, रवि शंकर कुमार, सिंटू यादव, अरुण कुमार आनंद,  तपेश्वरी यादव (शिक्षक) ,ओम जी, सुरेंद्र यादव, देवनारायण यादव ,विलास राम, भजन राम, योगेंद्र यादव, नुनूलाल  सादा , मनीष जी,एवं अन्य ग्रामीण मौजूद रहे।

 इस बैठक में यह भी तर्क दिया गया है कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव, और केंद्रीय मंत्री रहे  शरद यादव की मौत के बाद मृत्यु भोज का आयोजन नहीं किया गया था. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां के निधन के बाद भी मृत्यु भोज का आयोजन नहीं किया गया था.

 सहरसा से दिवाकर कुमार दिनकर की रिपोर्ट

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