जहानाबाद: पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव का हालिया बयान एक बार फिर बिहार की राजनीति में बेटियों की सुरक्षा और संवेदनशीलता के मुद्दे को केंद्र में ले आया है। जहानाबाद के पट्टियांवा गांव पहुंचकर पीड़ित परिजनों से मुलाकात करने के बाद पप्पू यादव ने न सिर्फ संवेदना जताई, बल्कि इस मामले को व्यापक राजनीतिक और सामाजिक विमर्श से जोड़ते हुए सत्ताधारी नेताओं की भूमिका पर गंभीर सवाल भी खड़े किए।
पप्पू यादव का केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह पर हमला केवल व्यक्तिगत आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उस राजनीति पर प्रहार था जो गंभीर अपराधों पर चुप्पी साधकर बयानबाज़ी के सहारे जनभावनाओं को मोड़ने का प्रयास करती है। उन्होंने “संस्कारहीन” और “कर्महीन” जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर यह संदेश देने की कोशिश की कि जनप्रतिनिधियों की असली कसौटी उनके कर्म और संवेदना से तय होती है, न कि उग्र या विभाजनकारी बयानों से।
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सांसद ने बिहार के विभिन्न जिलों—बेगूसराय, खगड़िया, पूर्णिया और जहानाबाद—में बच्चियों के साथ हुई घटनाओं का उल्लेख कर यह सवाल उठाया कि आखिर जिम्मेदार पदों पर बैठे नेता पीड़ित परिवारों से मिलने और न्याय की लड़ाई में साथ खड़े होने से क्यों कतराते हैं। उनका कहना था कि बेटियों के खिलाफ हो रहे अपराधों पर राजनीति करना आसान है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर संवेदना और कार्रवाई दिखाना कहीं अधिक जरूरी।
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इसके साथ ही पप्पू यादव ने मुंबई नगर निकाय चुनाव को लेकर भाजपा के खिलाफ दावा कर यह संकेत भी दिया कि देश के शहरी मतदाता अब कथित कॉरपोरेट-राजनीति से अलग रास्ता चुनने के मूड में हैं। हालांकि यह दावा चुनावी नतीजों पर ही परखा जाएगा, लेकिन यह बयान विपक्षी राजनीति की आक्रामक रणनीति को जरूर दर्शाता है। जहानाबाद की घटना और उस पर पप्पू यादव की प्रतिक्रिया यह याद दिलाती है कि बेटियों की सुरक्षा कोई दलगत मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी है। सवाल यह है कि क्या राजनीति बयानबाज़ी से आगे बढ़कर पीड़ितों के लिए ठोस न्याय और भरोसेमंद व्यवस्था दे पाएगी, या यह मुद्दा भी चुनावी शोर में दबकर रह जाएगा।