पटना: साल 2025 उपेंद्र कुशवाहा के लिए खुशियों की सौगात लेकर आया था। यह साल न सिर्फ राजनीतिक संघर्षों से जूझ रहे उपेंद्र कुशवाहा को बिहार की राजनीति में एक नई स्थिरता देने वाला साबित हुआ, बल्कि उनके परिवार को भी सत्ता और पहचान दिलाने का साल बना। उपेंद्र कुशवाहा ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में अपनी पत्नी स्नेहलता देवी को सासाराम विधानसभा सीट से चुनाव लड़वाया और विधायक बनवाया। वहीं, अपने बेटे दीपक प्रकाश को बिना किसी सदन की सदस्यता के सीधे बिहार सरकार में मंत्री बनवाकर राजनीतिक गलियारों में सबको चौंका दिया।
इतना ही नहीं, जिन लोगों ने उपेंद्र कुशवाहा को राजनीतिक रूप से समाप्त मान लिया था, उनके सामने उन्होंने अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा की दमदार मौजूदगी भी दर्ज कराई। बिहार विधानसभा के चुनाव में पार्टी को मिली 6 सीटों में से 4 सीटों पर जीत हासिल कर उन्होंने यह दिखा दिया कि वे अभी राजनीति के खेल से बाहर नहीं हुए हैं। लेकिन कहा जाता है कि सियासत में खुशियों को अक्सर नजर लग जाती है। जैसे-जैसे साल 2025 खत्म होने की ओर बढ़ा, वैसे-वैसे उपेंद्र कुशवाहा और उनकी पार्टी के सामने नई-नई राजनीतिक मुसीबतें सिर उठाने लगीं।
राज्यसभा सीट बनी सबसे बड़ी चुनौती
अप्रैल 2026 में बिहार से राज्यसभा की एक सीट को लेकर एनडीए के भीतर सियासी खींचतान तेज हो गई है। एक तरफ जीतन राम मांझी खुलकर यह कह चुके हैं कि एनडीए को मिलने वाली पांच राज्यसभा सीटों में से एक सीट पर उनका दावा है। दूसरी ओर चिराग पासवान भी अंदरखाने अपनी राजनीतिक फील्डिंग सेट करने में जुटे हैं। इसी बीच, अप्रैल 2026 में उपेंद्र कुशवाहा की राज्यसभा सदस्यता भी समाप्त हो रही है, और वे खुद एक बार फिर राज्यसभा में वापसी चाहते हैं। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह राह उनके लिए आसान नहीं दिख रही।
पार्टी के भीतर बगावत से बढ़ी चिंता
उपेंद्र कुशवाहा की मुश्किलें सिर्फ राज्यसभा तक सीमित नहीं हैं। जब से उनके बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाया गया है, तभी से पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी के चार में से तीन विधायक अब खुलकर बगावती रुख अपनाते नजर आ रहे हैं। बाजपट्टी के विधायक रामेश्वर महतो, मधुबनी के विधायक माधव आनंद और दिनारा के विधायक आलोक सिंह ने न सिर्फ पार्टी के कार्यक्रमों से दूरी बना ली, बल्कि पार्टी कार्यालय आना भी बंद कर दिया। राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा द्वारा बुलाई गई संगठनात्मक बैठकों से भी उन्होंने खुद को अलग रखा है। यहां तक कि उपेंद्र कुशवाहा की ‘लिट्टी-चोखा पार्टी’ से भी तीनों विधायकों ने दूरी बना ली, जबकि उसी दिन उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य नितिन नवीन से मुलाकात कर तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं।
रामेश्वर महतो का पोस्ट बना सियासी संकेत
12 दिसंबर को बाजपट्टी विधायक रामेश्वर महतो ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डालकर पार्टी नेतृत्व पर सीधा हमला किया। उन्होंने लिखा कि जब नेतृत्व की नीयत धुंधली हो जाए और नीतियां जनहित से ज्यादा स्वार्थ की दिशा में मुड़ने लगें, तब जनता को ज्यादा दिनों तक भ्रमित नहीं रखा जा सकता। आज का नागरिक जागरूक है और हर निर्णय, हर इरादे को बारीकी से परखता है। इस पोस्ट ने न सिर्फ उपेंद्र कुशवाहा के लिए खतरे की घंटी बजा दी, बल्कि पार्टी टूटने के संकेत भी दे दिए।
लिट्टी-चोखा पार्टी और बढ़ती चर्चाएं
25 दिसंबर को उपेंद्र कुशवाहा ने अपने आवास पर लिट्टी-चोखा पार्टी का आयोजन किया, लेकिन वहां भी पार्टी के तीनों विधायक नदारद रहे। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गईं कि पार्टी टूट के कगार पर है। उपेंद्र कुशवाहा परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं और पार्टी कार्यकर्ताओं समेत विधायकों की अनदेखी हो रही है। खुद उपेंद्र कुशवाहा राज्यसभा सांसद हैं, पत्नी विधायक हैं, बेटा मंत्री है और अब कयास लगाए जा रहा है कि वे अपनी बहू साक्षी मिश्रा को भी राज्य नागरिक परिषद के उपाध्यक्ष पद पर बैठाना चाहते हैं।
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31 दिसंबर का पोस्ट और असली संकेत
31 दिसंबर की सुबह एक बार फिर विधायक रामेश्वर महतो ने सोशल मीडिया पर तीनों बागी विधायकों की एक साथ तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि हम सब एक हैं, आज भी साथ हैं और आगे भी साथ रहेंगे। एनडीए की मजबूती और बिहार के सर्वांगीण विकास के संकल्प के साथ हम साथ-साथ हैं। जय एनडीए। इस पोस्ट में न तो राष्ट्रीय लोक मोर्चा का नाम था और न ही उपेंद्र कुशवाहा का कोई जिक्र। यह चुप्पी ही बहुत कुछ कहने के लिए काफी है।
पार्टी टूटने का गणित
राष्ट्रीय लोक मोर्चा के पास फिलहाल सिर्फ चार विधायक हैं। दल-बदल कानून के अनुसार यदि दो-तिहाई विधायक अलग होकर किसी दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं या अलग गुट की मान्यता मांगते हैं, तो विधानसभा अध्यक्ष उन्हें अलग मान्यता दे सकते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो यदि चार में से तीन विधायक अलग हो जाते हैं, तो उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी पूरी तरह टूट सकती है, और तीनों विधायक अलग गुट या नई पार्टी बना सकते हैं।
ऐसे में यह माना जा रहा है कि नया साल उपेंद्र कुशवाहा के लिए सिर्फ एक कैलेंडर का बदलाव नहीं, बल्कि राजनीतिक परीक्षा बनता नजर आ रहा है। राज्यसभा की लड़ाई, पार्टी के भीतर बगावत और परिवारवाद के आरोप—इन सबके बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि उपेंद्र कुशवाहा इस सियासी तूफान से निकल पाते हैं या नहीं।