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जीतन राम मांझी: डाक विभाग के क्लर्क से बिहार के मुख्यमंत्री तक का सफर, बोले- 75 के बाद इलेक्शन नहीं, मैं 79 का हूं

43 साल का करियर, 6-7 राजनीतिक वफादारियां... गया के मुसहर समाज से निकलकर पाटलिपुत्र की धरती पर अपनी सियासी पहचान कायम करने वाले जीतनराम मांझी की कहानी हमारी सियासत की खासियत बताती है. यहां समाज के बेहद निचले तबके से निकलकर सामने की कतार में खड़े होने की गुंजाइश तो है, लेकिन इसके लिए समझौते भी करने पड़ते हैं. कभी विचारधारा से तो कभी जन कल्याण की थ्योरी से.

हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्यूलर) के संस्थापक और एनडीए के सहयोगी जीतन राम मांझी ने बड़ा ऐलान किया है. उन्होंने कहा कि अब वो भविष्य में चुनाव नहीं लड़ेंगे. मांझी ने कहा कि 75 साल के बाद किसी व्यक्ति को भी चुनावी राजनीति नहीं करनी चाहिए, वैसे कुछ लोग हैं, जो चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन मैं तो 79 साल का हो गया हूं, और ऐसे में चुनाव लड़ना मेरे सिद्धांतों के खिलाफ होगा. ऐसे में अब वो किसी तरह का कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे.

जीतन राम मांझी ने नीतीश कुमार के एनडीए के पाले में आने की संभावनाओं को बल देते हुए कहा कि लालू यादव और तेजस्वी यादव पहले ही नीतीश कुमार को पलटूराम कह चुके हैं. कोई पलटू चाचा तो कोई पलटू भाई कहता है. जब नीतीश कुमार का डिजिग्नेशन ही पलटू राम है. तो किस समय पलटी मारेंगे इसका कोई हिसाब नहीं है. मांझी ने कहा कि हम एनडीए के एक छोटे सहयोगी हैं. हमारी कोई बहुत बड़ी भूमिका नहीं है कि हम किसी का स्वागत करेंगे या विरोध करेंगे. लेकिन अगर नरेंद्र मोदी या अमित शाह एनडीए में नीतीश को लाना चाहेंगे तो हम इसका विरोध करेंगे.

आपको बता दें हाल ही में जीतन राम मांझी ने दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी. और कहा था कि लोकसभा सीटों को लेकर वो मुलाकात करने नहीं आए थे. एनडीए जो भी सीट देगी, उस पर जीत की कोशिश रहेगी. हमारा उद्देश्य बिहार की सभी 40 सीटों पर एनडीए को जीत दिलाने में बीजेपी का सहयोग करना है. वहीं ठाकुर कविता विवाद पर जीतन राम मांझी का एनडीए से मतभेद सामने आया था. जहां बीजेपी ने आरजेडी सांसद मनोज झा का विरोध किया था और उनके बयान को जाति विरोधी करार दिया था. वहीं मांझी ने मनोज झा का समर्थन करते हुए कहा था कि उन्होंने कुछ गलत नहीं बोला, और न ही किसी जाति विशेष पर टिप्पणी की.

आइए एक नजर डालते हैं जीतन राम मांझी के राजनीतिक सफर पर............

राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता है. कई राजनेता इस बयान को अपनी सुविधा के अनुसार दोहराते आए हैं. लेकिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने इस बयान को भरपूर जीया है. अपने 43 साल के सियासी सफर में बिहार के छोटे मौसम वैज्ञानिक जीतनराम मांझी ने कांग्रेस के साथ अपनी राजनीति शुरू की और फिर जनता दल, आरजेडी, जेडीयू और बीजेपी के साथ सत्ता में रहे. 1980 से सियासत शुरू करने वाले जीतनराम मांझी अपने 43 साल के राजनीतिक सफर में  8 बार पाला बदल चुके हैं. दरअसल राजनीति में जीतनराम मांझी किसी के नहीं हैं और सभी के हैं. 

और अब जीतनराम मांझी ने 9वीं बार सौगंध तोड़ी है. ज्यादा दिन नहीं हुए......इसी साल 27 फरवरी को जीतनराम मांझी ने कहा था कि कसम खाकर कहता हूं नीतीश का साथ छोड़कर कभी नहीं जाऊंगा. लेकिन राजनीति का अपना मिजाज है, वो भी बिहार की राजनीति. मात्र कुछ ही दिन हुए; नीतीश के साथ मांझी की नैया डांवाडोल हो गई और नीतीश कुमार का साथ छूट गया. 

वैसे नीतीश के साथ मांझी का रिश्ता खास है. नीतीश ही वो नाम है जिन्होंने 2014 में जीतन राम मांझी को सीएम की कुर्सी थाली में सजा कर दी. कहने वाले इसे जो भी कहें लेकिन इसी घटनाक्रम के साथ जीतन राम मांझी सियासत के राष्ट्रीय फलक पर आए. उन्हें पैन इंडिया पहचान मिली. 

जीतनराम मांझी के वर्तमान को समझने के लिए उनके अतीत, उनके सफर को जानना जरूरी है.............बात लगभग 70 साल पहले की है. बिहार के गया जिले के महकार गांव में सात साल का एक बच्चा अपनी पहली 'ड्यूटी' पर गया. ये बच्चा था मुसहर समाज के शख्स रामजीत मांझी का बेटा... जीतनराम मांझी. 

जीतनराम मांझी खुद कहते हैं, "हमारा ऑफर आ गया...जिस मालिक के यहां पिता जी कमाते थे, उनके यहां से ऐ भगत... से तुम काम करबे करते हो...जीतना है वहां जानवर को देखेगा...खाएगा...पिएगा...अपना रहेगा. पिता जी को लगा ठीके है...7 बरस का है. अब वहां रह सकता है. वहां काम करना शुरू किया मेरा काम था 17 बैल, एक-दो भैस और दो-तीन गाय. उनको चारा खिलाना."..........समय का चक्र चलता रहा. 4 साल गुजर गए. 1944 में जन्मे जीतनराम मांझी 11 साल के हो गए. साल था 1955. देश की आजादी के बाद बदलाव की हवा चली तो उनके पिता को अपने बच्चे को पढ़ाने-लिखाने की चिंता हुई. लेकिन मांझी के पिता के मालिक इसके सख्त खिलाफ थे. 

जीतनराम मांझी कहते हैं, "सब कोई गुस्सा में आ गए... पढ़ा के अपन बेटवा के का कलेक्टर बनैएभीं. पढ़ावे के का जरूरत है. लेकिन पिता जी के दिमाग में ये बात थी कि बेटा को पढ़ाना है. ये बात उनलोगों को सेटबैक सा लगा कि हमारा एक विश्वासी मजदूर चला जाएगा. फिर एक कम्परमाइज का फॉर्मूला निकाला. वो ये था कि मालिक के बच्चों को पढ़ाने के लिए मास्टर आता ही है, जीतन काम काज करने के बाद 7 बजे उन्हीं लोगों के साथ बैठ जाएगा."

तो इस तरह मुसहर समाज के जीतनराम मांझी की पढ़ाई 11 साल की उम्र में शुरू हुई. मुसहर समाज यानी कि वो जाति वो भोजन की कमी की वजह से कभी-कभी चूहों को भी पकड़कर खाती है. संसाधनों की कमी की कसर मांझी ने अपने तेज बुद्धि के बल पर पूरी कर दी. उन्होंने गया के कॉलेज से डिग्री तक की पढ़ाई पूरी की. ग्रेजुएशन के दौरान ही मांझी नेतागिरी के बारे में सोचने लगे थे. मांझी 1966 में डाक विभाग में  क्लर्क बन गए. लेकिन क्लर्की में उनका मन कहां लगने वाला था. 

तब तक वे चुनाव को समझने लगे थे. तेज तो थे ही इलाके के नेता उन्हें अपनी प्रचार गाड़ी में ले जाते. इस तरह फील्ड की राजनीति से उनका राब्ता हुआ. तब मांझी कांग्रेस के लिए वोट मांगते थे. इस तरह एक दो चुनाव गुजर गए. मांझी एक इंटरव्यू में कहते हैं, "मुझे लगने लगा कि मैं जब दूसरे के लिए वोट मांग सकता हूं तो फिर अपने लिए क्यों नहीं? मांझी ने 13 सालों तक नौकरी की और 1980 में अपने सपने से रेस लगाने के लिए राजनीति में आ गए. इस बीच उनके भाई की भी सब इंस्पेक्टर के पद पर नौकरी लग गई थी. घर का खर्चा चलाने में थोड़ी सहूलियत हो गई.

1980 में मांझी को कांग्रेस से टिकट मिलने वाला था. लेकिन ऐन मौके पर उनका टिकट कट गया. तभी उनके लिए मददगार बनकर आए कांग्रेस नेता जगन्नाथ मिश्रा. कुछ किस्मत की मेहरबानी, कुछ अपनी कोशिश. जगन्नाथ मिश्रा की सिफारिश पर जीतनराम मांझी को फतेहपुर सीट से कांग्रेस का टिकट मिल गया. पढ़ाई के दौरान ही गया में लोकप्रिय हो चुके जीतन राम मांझी चुनाव जीतकर विधायकजी बन गए. 

इसके बाद उनका सियासी कारवां न रुकने वाले सफर पर चल निकला. 1983 में चंद्रशेखर सिंह की कांग्रेस सरकार में मांझी राज्यमंत्री बने. 90 के दशक में कांग्रेस ने बिन्देश्वरी दुबे, सतेंद्र नारायण सिन्हा और जगन्नाथ मिश्रा को सीएम बनाया, बिहार के सीएम बदलते रहे लेकिन मांझी का मंत्रीपद का कोटा 1990 तक सुरक्षित रहा.

1990 के दशक में बिहार की राजनीति में कांग्रेस का सितारा अस्त हुआ और लालू यादव नाम के नक्षत्र का उदय हुआ. 1990 में कांग्रेस हारी तो जीतनराम मांझी को भी शिकस्त झेलनी पड़ी. 10 साल की विधायिकी के बाद जीतन राम मांझी मंज चुके थे. वे अपना नफा नुकसान समझने लगे थे. जीतनराम मांझी जनता दल में शामिल हो गए. धीरे-धीरे लालू से उनकी नजदीकी बढ़ने लगी. 1996 में लालू ने जब राष्ट्रीय जनता दल बनाया तो मांझी उनके साथ थे. 1996 के उपचुनाव में बाराचट्टी विधानसभा सीट से जीतन राम मांझी चुनाव जीत गए. साल  2000 के चुनाव में मांझी को जीत मिली. 

मांझी अपनी संवाद शैली, सहज उपलब्धता की वजह से अपने क्षेत्र में लोकप्रिय बने रहे. 1996 से 2005 तक मांझी लालू यादव और राबड़ी की सरकार में मंत्री रहे...........साल 2005 बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव लेकर आया. आरजेडी सरकार की 15 साल बाद बिहार से विदाई हो गई. नीतीश कुमार को जनमत मिला. जीतनराम मांझी ने एक बार फिर से मौके को भांपते हुए अपनी राजनीतिक वफादारी नीतीश कुमार के साथ कर ली. बाराचट्टी सीट से वे एक बार फिर विजयी हुए. 2008 में नीतीश कुमार ने उन्हें मंत्री बनाया. 2010 के विधान सभा चुनाव में जीतनराम मांझी ने अपनी सीट बदल ली और वे जहानाबाद के मखदूमपुर सीट से जेडीयू के टिकट पर लड़े और विजयी हुए. 

2014 न सिर्फ देश की राजनीति में एक व्यापक शिफ्ट लेकर आया, बल्कि बिहार की राजनीति भी इससे प्रभावित हुई. 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले ही नीतीश बीजेपी से अपनी राहें जुदा कर चुके थे. 2014 में बीजेपी की प्रचंड जीत से नीतीश को करारा झटका लगा. 

नीतीश को ऐसे 'मांझी' की जरूरत थी जिसे बिहार की पतवार थमाकर वो आगे की रणनीति तय कर सकें. नीतीश की खोज जीतनराम मांझी पर जाकर टिकी. उन्होंने 9 मई, 2014 को इस्तीफा देकर बिहार की सत्ता अपने 'विश्वासपात्र' महादलित समाज के जीतनराम मांझी को सौंप दी. 

नीतीश ने सोचा कि मांझी उनके 'खड़ाऊं' के सहारे बिहार की सत्ता चलाएंगे. लेकिन सियासत में सब कुछ सोचे के मुताबिक कहां होता है. जीतनराम मांझी सीएम बनकर अपने दम पर फैसले लेने लगे. नीतीश से उनकी दूरियां बढ़ने लगी. जीतन राम मांझी ने एक इंटरव्यू में कहा था, "जो परिस्थितियां थी उसमें नीतीश अपना मुखौटा बचाना चाहते थे, उनका सूपड़ा साफ हो गया था लोकसभा चुनाव में, वो किसी तरह दो सीट जीत पाए थे." 

मांझी के अनुसार नीतीश ने नैतिकता का नाटक किया और अपनी खस्ता होती स्थिति से उबरने के लिए इस्तीफा दे दिया. मुझे उन्होंने ढाल बनाया. लोगों को कहेंगे कि नैतिकता के चलते इस्तीफा दिया, एक महादलित को सीएम बनाया. तीसरी सबसे अहम बात जो मांझी नीतीश को लेकर कहते हैं वो यह है कि उन्हें लगता था कि जीतन येस मैन हो सकता है. इसी भावना से उन्होंने मुझे सीएम बनाया. जीतन साफ कहते हैं कि मेरे सीएम बनने के बाद मंत्रिमंडल का निर्माण कैसे हुआ मुझे पता नहीं, एक कागज आया दस्तखत करने के लिए मैंने कर दिया. विभाग बांटने के दौरान भी ऐसा ही हुआ, एक लिस्ट आई मैंने साइन कर दिया.

लेकिन जब मैंने सोचा कि ये क्या हो रहा है. बदनामी हो रही है तो मेरी, नाम होगा तो नीतीश कुमार, इसलिए मैं संभल गया. ये वो मौका जब नीतीश और जीतनराम मांझी के बीच दूरियां बढ़ने लगी. जीतनराम मांझी मई 2014 से फरवरी 2015 तक नौ महीने बिहार के सीएम रहे. नौ महीना अच्छा खासा समय होता है. जीतन समझ चुके थे कि नीतीश की बागडोर और छत्रछाया से उन्हें निकलना ही होगा. उन्होंने 20 फरवरी 2015 को बिहार के सीएम से इस्तीफा दे दिया. 

इस दौरान मांझी को बिहार में जातिगत राजनीति की अहमियत समझ में आ गई थी. मांझी समझते थे कि जिस महादलित एजेंडे के भरोसे नीतीश ने बिहार में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की है, उस समुदाय से तो वे खुद ही आते हैं. इसी समय उन्होंने फैसला किया था बंदूक चलाने के लिए कंधा देने से तो अच्छा है कि खुद ही बंदूक थाम लो. उनके पास अनुभव था, शिक्षा थी और महादलितों का कैडर तो था ही. मांझी ने इसी मौके पर अपनी राजनीतिक पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा बनाने का ऐलान कर दिया. 

2015 में देश में नरेंद्र मोदी और बीजेपी की धूम थी. जीतनराम मांझी 2015 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के साथ हो लिए. लेकिन बिहार की अक्खड़ राजनीति में पहचानने में वे भूल कर गए. NDA के घटक दल के तौर पर उन्हें 21 सीटें लड़ने को मिलीं, लेकिन मांझी सिर्फ अपनी ही सीट जीत पाए. 

इस बीच नीतीश कुमार 2017 में बीजेपी के साथ आ चुके थे. इधर 2019 में जब लोकसभा चुनाव का वक्त आया तो जीतनराम मांझी NDA गठबंधन छोड़कर एक बार फिर से महागठबंधन में आ गए. इस लोकसभा चुनाव में HAM तीन लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन मांझी समेत तीनों ही कैंडिडेट चुनाव हार गए. 

जब 2020 विधानसभा चुनाव का वक्त आया तो जीतनराम मांझी एक बार फिर से नीतीश कुमार के साथ हो गए. कह सकते हैं कि वह एनडीए में आ गए. 2020 विधानसभा चुनाव में HAM को 7 सीटें मिलीं. इसमें से 4 पर पार्टी ने जीत हासिल की. नीतीश सरकार में जीतनराम मांझी के बेटे संतोष सुमन मंत्री बने. 

अब 13 जून 2023 को संतोष सुमन ने एक बार फिर से नीतीश सरकार से इस्तीफा दे दिया है और पार्टी के अगले कदम के ऐलान के लिए 18 जून को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है. लेकिन चर्चा है कि समय को भांप कर बिहार के छोटे मौसम वैज्ञानिक जीतनराम मांझी बीजेपी की ओर जा सकते हैं. इससे पहले जीतनराम मांझी 13 अप्रैल को दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाकात कर चुके हैं. 

सवाल है कि इस समय मांझी का झुकाव बीजेपी की ओर क्यों है? इस सवाल के जवाब में बिहार के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुनील पाण्डेय कहते हैं कि 2014 में जब से नीतीश ने मांझी को बिहार का सीएम बनाया तो उनकी इच्छाशक्ति में इजाफा हुआ है. मांझी अब रुकना नहीं चाहते हैं. 

लेकिन क्या 5 लोकसभा सीटों की मांझी की डिमांड पूरी होगी. इसके जवाब में वरिष्ठ पत्रकार सुनील पाण्डेय कहते हैं कि इस बात के बेहद कम आसार हैं कि बीजेपी मांझी को 5 सीट दे देगी. अधिक से अधिक उन्हें एक या दो सीट सीट मिल सकती है. हां अगर आगे परिस्थितियां और समीकरण ठीक रहे तो बीजेपी बाद में मांझी को राज्यसभा भेज सकती है अथवा उन्हें राज्यपाल बना सकती है, लेकिन ये भविष्य के गर्त में छिपा है. उन्होंने कहा कि जीतनराम मांझी की राजनीतिक ताकत मगध बेल्ट तक ही सीमित है. वे मुसहरों के भी एकछत्र नेता नहीं हैं. बीजेपी इस बात को समझती है. इसलिए लोकसभा चुनाव के दौरान में बीजेपी मांझी को बतौर चेहरा ज्यादा इस्तेमाल करना चाहती है. 

दरअसल 78 साल के हो चुके जीतनराम अब अपनी अगली पीढ़ी के लिए सोच रहे हैं. मांझी की ये सारी तैयारियां भी 2024 लोकसभा चुनाव को लेकर है. इस चुनाव में मांझी अपने लिए ज्यादा से ज्यादा सीट चाहते हैं. कुछ दिन पहले नीतीश कुमार के साथ एक मुलाकात में नीतीश के सामने मांग रखी थी कि उनकी पार्टी 5 लोकसभा सीटों पर लड़ेगी. 40 सीटों वाले बिहार के लिए ये बड़ा हिस्सा है. मांझी ने कहा था कि हम जिधर रहेंगे, उधर जीतेंगे. ये सभी को पता है.