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बिहार में क्या होने वाला है, नीतीश कुमार की पार्टी टूट जाएगी.....नीतीश-लालू की मुलाकात के निकले 'सटीक' सियासी मायने!

क्या बिहार में कुछ खेला होने वाला है? सूबे के दो सियासी दिग्गज नीतीश और लालू आखिर क्यों बार-बार मुलाकात कर रहे? सीट शेयरिंग का ही मामला है या फिर विपक्षी इंडिया गठबंधन में पीएम फेस को लेकर फंसा पेंच अहम मुद्दा है. आखिर सीएम आवास पर लालू-नीतीश के बीच क्या बात हुई. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की लगातार होती रहीं मुलाकातों की असल वजह क्या है? यह अब तक किसी की समझ में नहीं आ रही थी. अब इस रहस्य से धीरे-धीरे पर्दा उठने लगा है. महागठबंधन के साथ आने से पहले भी नीतीश कभी कभार लालू के घर जाते रहे हैं. इधर हफ्ते में वे दो बार मुलाकात के लिए राबड़ी देवी के आवास पर पहुंचे थे. लेकिन, यह पहला मौका है, जब लालू यादव खुद गुरुवार को नीतीश के घर पहुंच गए. हफ्ते भर के अंदर अपनी-अपनी पार्टी के दोनों शीर्ष नेताओं की यह दूसरी मुलाकात है.

सूबे का सियासी पारा चढ़ा हुआ है

बिहार में अभी कोई चुनाव नहीं है लेकिन सूबे का सियासी पारा चढ़ा हुआ है. इसकी वजह है राज्य में लगातार हो रहे राजनीतिक घटनाक्रम. यही नहीं नीतीश कुमार और लालू यादव की एक हफ्ते में लगातार दूसरी मीटिंग को लेकर भी चर्चाओं का दौर तेज है. हर कोई ये जानना चाहता है कि आखिर आरजेडी सुप्रीमो ने गुरुवार को अचानक सीएम ऑफिस पहुंचकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात क्यों की. लालू यादव इस दौरान मुख्यमंत्री आवास में करीब 25 मिनट रहे. दोनों सियासी दिग्गजों की इस मीटिंग में क्या बात हुई, हर कोई ये जानना चाहता है.

सीएम नीतीश को पीएम उम्मीदवार बताने से सियासत गर्म

लालू यादव ने 28 सितंबर की सुबह मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास का दौरा किया और वहां लगभग 25 मिनट बिताए. सूत्रों ने बताया कि दोनों नेताओं ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी एकता गठबंधन INDIA में शामिल दलों के बीच सीट बंटवारे पर चर्चा की. इन मुलाकातों के बाद लालू प्रसाद की पार्टी राजद के नेताओं ने शुक्रवार को नीतीश कुमार को पीएम उम्मीदवार के लिए सबसे योग्य बताकर सियासत को और भी गर्म कर दिया.

भाकपा की चर्चा

इस बीच, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के राष्ट्रीय महासचिव डी. राजा ने बुधवार को राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद से मुलाकात की और केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ लड़ाई तेज करने को लेकर चर्चा की. विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया में शामिल दलों के नेताओं के तेजी से हुई इन मुलाकातों को लेकर अब मायने निकाले जाने लगे हैं. कहा जा रहा है कि गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर तस्वीर साफ नहीं होने के कारण सभी दल पेशोपेश हैं.

सीट बंटवारा मामला

सूत्रों का मानना है कि सभी दल चाहते हैं कि सीटों का बंटवारा हो जाए. राजद के एक नेता नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर कहते हैं कि सीट बंटवारे को लेकर अंधकार कायम है. उन्होंने तो यहां तक कहा कि राजद और जदयू भी असमंजस में हैं कि वे कितनी सीटों पर चुनाव लडेंगे. हालांकि, उससे पूर्व चर्चा ये थी कि जेडीयू और आरजेडी ने एक तरह से सीटों को लेकर अपना फॉर्म्युला फिक्स कर लिया है. सियासी जानकारों के मुताबिक लालू यादव कतई नहीं कांग्रेस को 10 सीट देने जा रहे हैं. 32 से 34 सीट जेडीयू और आरजेडी के बीच रहने का अनुमान है. उसके बाद ही किसी की चर्चा होगी. उधर, लालू की पार्टी के सूत्रों का कहना है कि बिहार में जेडीयू के विधायक काफी कम हैं. उस हिसाब से सीट का मामला भी तय होगा.

नीतीश कुमार की पार्टी टूट जाएगी

बता दें कि 'नीतीश कुमार की पार्टी टूट जाएगी. उनकी पार्टी के कई नेता एनडीए नेताओं के संपर्क में हैं' यह दावा उपेंद्र कुशवाहा, आरसीपी सिंह और चिराग पासवान अक्सर करते रहे हैं. खुद नीतीश कुमार हाल के दिनों में कई मौकों पर बीजेपी के प्रति अपनी नजदीकी का एहसास कराते रहे हैं. इससे उन अटकलों को हवा मिलती रही है कि नीतीश कुमार का मन फिर डोल रहा है. ऐसी आशंका का पुख्ता आधार भी है. साल 2005 के पहले से ही बीजेपी के करीब रहे नीतीश ने लगातार 15 साल तक बीजेपी के साथ बिहार में सरकार चलाई है. पहली बार साल 2015 में उन्होंने बीजेपी से अलग होकर आरजेडी के साथ विधानसभा का चुनाव लड़ा और उनकी पार्टी को खासा कामयाबी भी मिली थी. आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस के साथ बिहार में बने महागठबंधन के नेता के रूप में उन्होंने बिहार की फिर कमान संभाल ली.

हालांकि 2017 आते-आते उनका मन महागठबंधन से ऊब गया और उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ कर बीजेपी का हाथ पकड़ लिया. यह रिश्ता साल 2022 तक ही चल पाया. नीतीश फिर पलट कर महागठबंधन के साथ हो गए. उन्हें सीएम की कुर्सी आरजेडी ने सौंप दी. तब नीतीश कुमार को इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि इस खेल में उन्हें आगे किन मुश्किलात का सामना करना पड़ सकता है.

नीतीश न पीएम फेस बन पाए, न 'इंडिया' के संयोजक

महागठबंधन में आरजेडी ने नीतीश का स्वागत किया और उनकी शर्तें भी स्वीकार लीं. उन्हें सीएम बना दिया, लेकिन अपनी शर्त भी लाद दी कि वे राष्ट्रीय राजनीति का रुख करें. तेजस्वी के लिए जितनी जल्दी हो, बिहार की कुर्सी खाली करें. वे विपक्षी दलों को एकजुट कर 1977 जैसा मोर्चा बनाएं. आरजेडी उन्हें विपक्ष की ओर से पीएम पद का उम्मीदवार बनने में पूरा सहयोग करेगा. नीतीश अपने तिकड़म में तो उस वक्त कामयाब रहे, लेकिन उन्हें अपनी औकात का तभी पता चल गया, जब सोनिया गांधी से मुलाकात के लिए उन्हें लालू यादव का सहारा लेना पड़ा. सोनिया ने भी बेमन से मुलाकात कर उन्हें टरका दिया. इसके बाद नीतीश ने चुप्पी साध ली. उन्हें तभी एहसास हो गया कि राहुल गांधी के रहते पीएम पद की दावेदारी करनी मुश्किल होगी.

विपक्षी एकता का टास्क पूरा करने का फल नहीं मिला

नीतीश कुमार ने उसके बाद से पीएम पद की दावेदारी से इनकार का सिलसिला शुरू कर दिया. भले ही उनकी पार्टी जेडीयू के लोग बार-बार यह कहते रहे कि नीतीश पीएम मटेरियल हैं या उनमें पीएम बनने के सारे गुण मौजूद हैं, लेकिन नीतीश ऐसी किसी संभावना से इनकार करते रहे. यहां तक कि बाद में जब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उन्हें बातचीत के लिए बुलाया और विपक्षी दलों को एकजुट करने का टास्क दिया, तब से नीतीश खुल कर यह कहने लगे कि वे पीएम पद के दावेदार नहीं हैं. जिन विपक्षी दलों से उन्होंने एकजुटता प्रस्ताव के साथ मुलाकात की, उन सबको आश्वस्त किया कि वे पीएम बनने की रेस में नहीं हैं. बहरहाल, विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' तो बन गया, लेकिन नीतीश को संयोजक बनने की चर्चाओं पर विराम लग गया. अब तो यह उम्मीद खत्म ही हो गई है.

नीतीश को चाहिए 16 सीटें, नहीं मिली तो टूटेगा जेडीयू?

नीतीश कुमार को अब एहसास हो रहा है कि बीजेपी का साथ छोड़ कर उन्होंने बड़ी गलती कर दी. पीएम और संयोजक बनने की बात सपना हो ही गई, अब उनके सामने अपने 16 सिटिंग सांसदों को दोबारा उम्मीदवार बनाने के लिए पापड़ बेलने पड़ रहे हैं. नीतीश अगर लालू से मिलने बार-बार जाते रहे हैं तो इसके पीछे यही वजह है. लालू कुछ बोल नहीं रहे, जिससे नीतीश की बेचैनी बढ़ती जा रही है.

भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक, आरजेडी ने लोकसभा टिकटों के बंटवारे के लिए विधायकों की संख्या को आधार बनाने की बात कह दी है. ऐसा हुआ तो नीतीश का सारा खेल बिगड़ सकता है. नीतीश को वह बात भी आरजेडी ने याद दिला दी है कि विधायकों की संख्या को आधार बना कर ही उन्होंने बीजेपी से बराबर का हिस्सा ले लिया था. महागठबंधन के घटक वाम दल भी यही बात कह रहे हैं. टिकटों के बंटवारे का यही आधार तय होता है तो नीतीश अपने सिटिंग सांसदों को टिकट नहीं दिला पाएंगे. ऐसे में टिकट से वंचित जेडीयू के नेता दूसरे दलों का रुख करेंगे. तब जेडीयू के टूटने की आशंका बढ़ जाएगी. नीतीश कुमार को पार्टी में टूट का भय ही सता रहा है. शायद यही वजह है कि वे बीजेपी के लिए खिड़की खोल कर रखना चाहते हैं.