इन दिनों संसद में जिस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा बहस हो रही है, वह है पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की कथित अप्रकाशित किताब और उसमें लिखी गई बातें। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का कहना है कि इस किताब में 2020 के लद्दाख भारत-चीन टकराव से जुड़े कई अहम सच दर्ज हैं, जिन्हें सरकार देश के सामने आने से रोक रही है। राहुल गांधी के अनुसार, किताब में लिखा है कि उस समय चीनी सैनिक और टैंक कैलाश रिज तक पहुँच गए थे। यह स्थिति बहुत गंभीर थी, क्योंकि इससे भारत की सुरक्षा को सीधा खतरा था। किताब में यह भी बताया गया है कि तत्कालीन सेना प्रमुख नरवणे ने इस बारे में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से बात की और पूछा कि आगे क्या करना चाहिए, लेकिन उन्हें तुरंत कोई साफ जवाब नहीं मिला।
किताब के अंशों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से यही संदेश मिला कि “जो उचित समझो, वही करो”। राहुल गांधी का कहना है कि इतनी बड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती के समय देश के नेतृत्व को स्पष्ट और मजबूत फैसला लेना चाहिए था, न कि जिम्मेदारी दूसरों पर छोड़नी चाहिए थी। किताब में यह भी लिखा बताया जा रहा है कि नरवणे उस समय खुद को “अकेला महसूस कर रहे थे”, क्योंकि उन्हें ऊपर से ठोस निर्देश नहीं मिल रहे थे।
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सरकार और सत्तापक्ष का कहना है कि यह किताब अभी भारत में प्रकाशित नहीं हुई है और किसी अप्रकाशित व अप्रमाणित स्रोत से संसद में उद्धरण देना नियमों के खिलाफ है। इसलिए राहुल गांधी को बोलने से रोका गया। यह पूरा विवाद सिर्फ एक किताब का नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि देश की सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों पर पारदर्शिता कितनी जरूरी है। जनता जानना चाहती है कि 2020 के संकट के दौरान वास्तव में क्या हुआ और फैसले कैसे लिए गए।
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लोकतंत्र में विपक्ष का काम सवाल उठाना है और सरकार का काम जवाब देना। अगर दोनों पक्ष खुलकर और ईमानदारी से बात करें, तो सच सामने आ सकता है। नरवणे की किताब को लेकर उठा यह विवाद हमें यही सिखाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर राजनीति से ऊपर उठकर सच और जवाबदेही को प्राथमिकता देनी चाहिए। तभी लोकतंत्र मजबूत बनेगा और जनता का भरोसा कायम रहेगा।