बिहार की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। पूर्णिया सांसद पप्पू यादव की गिरफ्तारी के बाद राज्य के कई जिलों में विरोध-प्रदर्शन तेज हो गए हैं। समर्थक इसे राजनीतिक साजिश बता रहे हैं, जबकि सरकार इसे कानून सम्मत कार्रवाई करार दे रही है। इस टकराव के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है या फिर असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश?
पप्पू यादव की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही पूर्णिया, जहानाबाद समेत कई इलाकों में समर्थकों ने सड़कों पर उतरकर विरोध जताया। शहीद चौक पर सांसद प्रतिनिधि नैयर मसूद खान के नेतृत्व में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का पुतला दहन किया गया। प्रदर्शनकारियों ने नारेबाजी करते हुए आरोप लगाया कि 30-31 साल पुराने मामले को अचानक सक्रिय कर सरकार ने बदले की राजनीति की है।
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जहानाबाद में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने हॉस्पिटल मोड़ से अरवल मोड़ तक आक्रोश मार्च निकाला। पूर्व जिला अध्यक्ष हरि नारायण द्विवेदी ने कहा कि पप्पू यादव पटना के चर्चित नीट छात्रा कांड में लगातार सवाल उठा रहे थे और न्यायिक जांच की मांग कर रहे थे, जिससे सरकार असहज हो गई। उनका आरोप है कि इसी कारण जंतर-मंतर पर प्रस्तावित धरना से पहले ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
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छात्र नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नीट छात्रा मामले में असली दोषियों को बचाया जा रहा है, जबकि आवाज उठाने वालों को निशाना बनाया जा रहा है। उनका दावा है कि पप्पू यादव जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाते रहे हैं, इसलिए उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया। सरकार की ओर से अब तक यही कहा जा रहा है कि कार्रवाई कानून के दायरे में है। लेकिन समय, तरीका और पुराने मामलों को अचानक सामने लाना कई सवाल खड़े करता है। लोकतंत्र में असहमति की आवाज को दबाने की बजाय पारदर्शी जांच और निष्पक्ष प्रक्रिया ही विश्वास बहाल कर सकती है। फिलहाल, पप्पू यादव की गिरफ्तारी बिहार की सियासत में एक नए राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत बन चुकी है।