पटना: बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद संत परंपरा को सम्मान देने की अपनी पहल के तहत इस बार संत शिरोमणि रविदास जयंती को भव्य और व्यापक स्तर पर मनाने जा रहा है। आयोजन को लेकर पर्षद की तैयारियां तेज हैं और राजधानी पटना से लेकर पूरे राज्य में इसका संदेश पहुंचाने की योजना बनाई गई है। पर्षद के अध्यक्ष प्रो रणबीर नंदन ने बताया कि एक फरवरी को पटना के रविन्द्र भवन में संत रविदास जयंती का मुख्य राज्य स्तरीय कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसके साथ ही बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद द्वारा यह आयोजन राज्य के सभी जिलों में भी किया जाएगा, ताकि संत रविदास के विचार गांव-गांव और जन-जन तक पहुंच सकें।
प्रो नंदन ने कहा कि संत रविदास का जीवन कर्तव्यपरायणता, भक्ति और सामाजिक समानता का अद्भुत उदाहरण है। वे अपने पैतृक चर्मकार कर्म को पूरी निष्ठा से करते हुए हरि भजन और परोपकार में लीन रहते थे। उन्होंने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि मनुष्य की पहचान जन्म या जाति से नहीं, बल्कि कर्म, चरित्र और भक्ति से होती है। “जाति पाति पूछे न कोई, हरि को भजै सो हरि का होई” और “मन चंगा तो कठौती में गंगा” जैसे उनके वचन आज भी समाज को आत्ममंथन की प्रेरणा देते हैं।
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प्रो नंदन ने कहा कि संत रविदास ने जाति-पाति और सामाजिक भेदभाव का खुलकर खंडन किया। उनसे जुड़ी कथाएं, जैसे कठौती में गंगाजल प्रकट होना या स्वर्ण जनेऊ की कथा, यह संदेश देती हैं कि सच्ची पवित्रता भीतर होती है, बाहरी आडंबर में नहीं। उनके कई पद सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं, जो उनकी आध्यात्मिक ऊंचाई और सार्वभौमिक स्वीकार्यता का प्रमाण है। उन्होंने बताया कि संत रविदास द्वारा प्रवर्तित रविदासिया पंथ आत्मज्ञान, नाम जप और सामाजिक समरसता पर आधारित है। ईश्वर के नाम का स्मरण ही जीवन को काम, क्रोध और लोभ जैसे विकारों से मुक्त करता है, यही उनकी शिक्षाओं का मूल संदेश है।
इस कार्यक्रम के संयोजक पर्षद के सदस्य हिमराज राम होंगे। आयोजन में राज्य के विभिन्न हिस्सों से कई प्रतिष्ठित धर्माचार्य शामिल होंगे। भजन, कीर्तन और संतवाणी के माध्यम से संत रविदास के विचारों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जाएगा। इस अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, विजय सिन्हा तथा मंत्रीगण विजय चौधरी, अशोक चौधरी और सुनील कुमार को आमंत्रित किया गया है। गौरतलब है कि बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद ने सभी महान भारतीय संतों की जयंती को संस्थागत रूप से मनाने का निर्णय लिया है। इसी क्रम में पहले स्वामी विवेकानंद जयंती का आयोजन हुआ और अब संत रविदास जयंती मनाई जा रही है। पर्षद का मानना है कि संतों की परंपरा भारतीय संस्कृति की आत्मा है और उनके विचार आज के सामाजिक जीवन के लिए भी उतने ही मार्गदर्शक हैं।
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