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बिहार में लोकसभा और विधानसभा चुनाव होंगे एक साथ, क्या है जल्द चुनाव की संभावनाओं का महिला आरक्षण बिल से कनेक्शन!

केंद्र सरकार ने मंगलवार को नए संसद भवन में प्रवेश करने के साथ ही पिछले 27 सालों से लंबित महिला आरक्षण बिल पेश कर दिया जिसको लेकर बिहार में जबरदस्त सियासी भूचाल देखने को मिल रहा है. कांग्रेस ने जहां पहले ही महिला आरक्षण बिल को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी है, वहीं मंगलवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड ने भी महिला आरक्षण बिल को अपना समर्थन दे दिया. 

नीतीश कुमार ने महिला आरक्षण बिल को लेकर सोशल मीडिया पर लिखते हुए इसका स्वागत किया और कहा कि उनकी सरकार ने बिहार में 2006 से ही पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया हुआ है. नीतीश ने कहा कि 2016 से ही उन्होंने बिहार में सरकारी नौकरियों में 35% आरक्षण की व्यवस्था महिलाओं के लिए कर रखी है और साथ ही 2013 से बिहार पुलिस में भी महिलाओं को 35% आरक्षण दिया जा रहा है.

महिला आरक्षण बिल को नीतीश का समर्थन!

केंद्र सरकार के द्वारा महिला आरक्षण बिल पेश किए जाने के साथ ही इस बात की संभावना जताई जा रही थी कि नीतीश कुमार भी इस बिल को अपना समर्थन देंगे और हुआ भी ऐसा ही. दरअसल, नीतीश कुमार ने बिहार में कुछ सालों में जिस तरीके से महिलाओं को सशक्त करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की है उसके बाद महिला आरक्षण बिल का विरोध करना उनके लिए संभव नहीं था. इसी कारण से नीतीश कुमार ने तुरंत ही इस बिल को अपना समर्थन दिया और माना जा रहा है कि जब लोकसभा और राज्यसभा में इस पर वोटिंग होगी तो जनता दल यूनाइटेड के सांसद इस बिल के समर्थन में वोट करेंगे.

महिला आरक्षण बिल और लालू कनेक्शन!

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल हमेशा से ही महिला आरक्षण बिल के विरोध में रही है और यही कारण है कि पिछले 27 सालों में यह बिल लोकसभा में पास नहीं हो पाया है. लोकसभा में पहली बार महिला आरक्षण बिल 1996 में एचडी देवेगौड़ा की सरकार में पेश किया गया था मगर तब से लेकर अब तक यानी पिछले 27 सालों में इस बिल को कोई भी सरकार पास करवाने की हिम्मत नहीं दिखा पाई है.

पिछले 27 सालों में अगर इस बिल को पास नहीं करवाया जा सका है तो इसके पीछे लालू प्रसाद की महत्वपूर्ण भूमिका थी. 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में महिला आरक्षण बिल 13 जुलाई 1998 को कानून मंत्री थंबी दुरई ने पेश किया था मगर उस दौरान भी लोकसभा में जमकर हंगामा मचाया गया था और राजद सांसद सुरेंद्र यादव ने लालकृष्ण आडवाणी के हाथों से इस बिल की कॉपी लेकर फाड़ दिया था.

इसके बाद 1999 में और फिर 2003 में वाजपेई सरकार ने महिला आरक्षण बिल को पास करने की कोशिश की मगर लालू, मुलायम और शरद यादव की तिकड़ी ने लोकसभा में इस बिल को पास नहीं होने दिया. 2010 में जब एक बार फिर से मनमोहन सिंह सरकार में इस बिल को पास करने की कोशिश की गई थी तो नाराज लालू ने इस बिल का विरोध करते हुए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था.

फंस गए लालू? आगे कुआं, पीछे खाई

कांग्रेस और नीतीश कुमार दोनों ने ही महिला आरक्षण बिल का समर्थन किया है. इसके बाद अब सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या लालू 2010 की पुनरावृत्ति करते हुए क्या बिहार में महागठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेंगे? महिला आरक्षण बिल को लेकर जो बिहार में स्थिति बनी है उसके बाद अब यह साफ कहा जा सकता है कि लालू प्रसाद के लिए यह बिल गले की हड्डी बन चुका है और उनके लिए आगे कुआं पीछे खाई जैसी स्थिति है.

लालू प्रसाद जिन्होंने तीन दशक से इस बिल का विरोध किया था वह अब क्या इस बिल का समर्थन करेंगे यह संभव नहीं लगता है. पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने सोशल मीडिया पर इस बिल के खिलाफ लिखा है और कहा है कि जब तक पिछड़ी जाति और अति पिछड़ी जाति की महिलाओं को महिला आरक्षण बिल में अलग से आरक्षण नहीं दिया जाता है, तब तक यह बिल बेईमानी है. यानी स्पष्ट है कि आरजेडी इस बिल का समर्थन नहीं करेगी.

अगर 2010 से 2023 की तुलना करें तो हालत भी लालू के लिए बहुत बदले हुए हैं. 2010 में लालू ने महिला आरक्षण बिल का विरोध करते हुए मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, मगर क्या 2023 में भी वह ऐसा कर पाएंगे? यह बड़ा सवाल बना हुआ है.

लालू की राजनीति और भविष्य की संभावनाएं!

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद अगर महिला आरक्षण बिल का विरोध करते हैं तो फिर क्या वह बिहार में महागठबंधन सरकार में बने रहेंगे या फिर सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे? यह फैसला लालू को लेना है क्योंकि मौजूदा समय में लालू प्रसाद के छोटे बेटे तेजस्वी यादव बिहार सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं. सवाल खड़े होते हैं कि क्या लालू प्रसाद इस बिल के विरोध करते हुए बिहार सरकार से समर्थन वापस लेंगे. क्योंकि अगर वह ऐसा करते हैं तो राजद के हाथों से एक बार फिर सत्ता चली जाएगी और तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने का सपना फिलहाल सपना ही रह जाएगा.

सवाल खड़ा होता है कि क्या लालू प्रसाद ऐसा चाहेंगे. क्या लालू प्रसाद 2024 लोकसभा चुनाव से पहले ऐसी कोई स्थिति बनने देंगे कि उनकी पार्टी सत्ता से अलग हो जाए क्योंकि फिर इसका खामियाजा 2024 लोकसभा चुनाव में राजद को उठाना पड़ सकता है. दूसरी तरफ अगर आरजेडी नीतीश कुमार के साथ सत्ता में बनी रहती है तो फिर लालू पर भी सवाल खड़े होंगे कि वह महिला आरक्षण बिल का विरोध तो कर रहे हैं लेकिन अपने बेटे को उपमुख्यमंत्री बनाए रखने के लिए सरकार से समर्थन नहीं ले रहे हैं.

नीतीश और अमित शाह की भविष्यवाणी!


महिला आरक्षण बिल का विरोध करते हुए अगर लालू प्रसाद बिहार में नीतीश कुमार सरकार से समर्थन वापस ले लेते हैं तो क्या 6 महीने के बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के साथ ही बिहार विधानसभा चुनाव भी हो जाएंगे? ऐसी संभावना इसलिए भी जताई जा रही है, क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ-साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी ऐसी भविष्यवाणी की है. नीतीश कुमार कई मौकों पर कह चुके हैं कि चुनाव तय समय से पहले हो सकते हैं और अमित शाह ने भी 2 दिन पहले झंझारपुर में हुई जनसभा में संबोधित करने के दौरान कहा था कि बिहार में जल्द चुनाव होंगे. इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर लालू प्रसाद के बिहार सरकार से समर्थन लेने के बाद जो स्थिति बनेगी तो क्या उसे स्थिति में नीतीश कुमार सरकार को बीजेपी बाहर से समर्थन देगी और फिर क्या अगले साल बिहार में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हो जाएंगे?