बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है—और इस बार संकेत केवल बदलाव के नहीं, बल्कि एक युग के अंत और नए सत्ता संतुलन की शुरुआत के हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हालिया राजनीतिक कदमों और उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों के बीच छिपे संदेश अब धीरे-धीरे स्पष्ट होते जा रहे हैं। 5 मार्च को राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करते समय नीतीश कुमार का “एक महीना पांच दिन” वाला बयान अब सियासी गलियारों में खासा चर्चा का विषय बन गया है। इस एक वाक्य ने मानो उनके अगले कदमों की समय-सीमा तय कर दी थी। यदि उस बयान को आधार माना जाए, तो 10 अप्रैल तक उनका बिहार में सक्रिय रहना और उसके बाद दिल्ली की ओर रुख करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगता है।

राज्यसभा चुनाव में जीत के बाद भी मुख्यमंत्री का लगातार सक्रिय रहना—समृद्धि यात्रा, रामनवमी कार्यक्रम, और विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोह में भागीदारी—यह संकेत देता है कि वे अपनी पारी का समापन किसी जल्दबाजी में नहीं, बल्कि एक नियंत्रित और व्यवस्थित तरीके से करना चाहते हैं। 30 मार्च तक विधान परिषद से इस्तीफा देने की संवैधानिक बाध्यता भी इस पूरे घटनाक्रम को समयबद्ध बना रही है। राजनीतिक सूत्रों की मानें तो 12 अप्रैल को नीतीश कुमार दिल्ली जा सकते हैं, 13 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेंगे और फिर 14-15 अप्रैल के बीच मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं। हालांकि आधिकारिक तौर पर अभी कोई पुष्टि नहीं है, लेकिन एनडीए के भीतर की हलचल इस दिशा में स्पष्ट संकेत दे रही है।

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इस बीच, भाजपा और सहयोगी दलों के नेताओं के बयान भी कम दिलचस्प नहीं हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी जहां “नई परिस्थिति” बनने की बात कर रहे हैं, वहीं चिराग पासवान ने साफ तौर पर कहा है कि अगला मुख्यमंत्री भाजपा का होना चाहिए। यह बयान केवल व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर बदलते शक्ति संतुलन की ओर इशारा करता है। अगर यह परिदृश्य साकार होता है, तो बिहार में पहली बार भाजपा के नेतृत्व में सरकार बन सकती है। संभावित नामों में सम्राट चौधरी, नित्यानंद राय, मंगल पांडेय और संजीव चौरसिया शामिल हैं, लेकिन अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में ही माना जा रहा है। “पर्ची मॉडल” की चर्चा इस बात को और पुख्ता करती है कि निर्णय अचानक और चौंकाने वाला हो सकता है।

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नीतीश कुमार की संभावित विदाई भी साधारण नहीं होगी। जिस तरह 2014 में नरेंद्र मोदी के लिए गुजरात विधानसभा में विशेष सत्र आयोजित कर उन्हें विदाई दी गई थी, उसी तरह बिहार में भी एक प्रतीकात्मक और गरिमामय समापन की चर्चा है। यह केवल एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि उस राजनीतिक शैली का अंत होगा जिसने दो दशकों तक बिहार की सत्ता को परिभाषित किया। अब निगाहें आने वाले दो हफ्तों पर टिकी हैं—जहां हर तारीख, हर बयान और हर बैठक बिहार की राजनीति की नई कहानी लिख सकती है।