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रोहिणी को पसंद नहीं आया बिहार का बजट, कहा 'जल्द ही दम तोड़ देगा झूठ का ढिंढोरा...'

rohini ne budget par kiya tanj

पटना: बिहार विधानसभा के बजट सत्र के दूसरे दिन वित्त मंत्री विजेंद्र यादव ने सदन में राज्य के अगले वित्तीय वर्ष का बजट पेश किया। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए उन्होंने 3 लाख 47 हजार से अधिक राशि का बजट पेश किया और बिहार को अगले पांच वर्षों में अग्रिम राज्यों की श्रेणी में खड़ा होने तथा सबसे तेजी से विकास करने वाले राज्यों की श्रेणी में बताया। वित्त मंत्री विजेंद्र यादव के द्वारा पेश बजट पर एक तरफ NDA के नेता एवं विधायकों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी तो राजद सुप्रीमो लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य को पसंद नहीं आया। रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया के माध्यम से बिहार के बजट को खोखला बताया और कहा कि डबल इंजन वाली सरकार के नीति निर्धारकों को यह भान नहीं है कि विकास का पीता जाने वाला झूठा ढिंढोरा जल्द ही दम तोड़ देगा।

रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि 'आंकड़ों की बाजीगरी वाले बजट को प्रस्तुत कर खुद अपनी पीठ थपथपाने से पहले नीतीश सरकार को ये समझना होगा कि  आर्थिक विकास के साथ मानव विकास और मानव विकास की खुशहाली के सूचकों का सतत मूल्यांकन किए जाने वाली आर्थिक नीति व्  अर्थव्यवस्था आज बिहार की सबसे बड़ी जरूरत है, मगर अफ़सोस की बात है कि आज प्रस्तुत किया गया बजट इस पर मौन है ..  डबल-इंजन वाली सरकार  के नीति - निर्धारकों को शायद ये भान नहीं है  कि विकास का पीटा जाने वाला झूठा ढिंढोरा भी जल्द ही दम तोड़ देगा, यदि लोगों को हक के रूप में बुनियादी सेवाएं नहीं मिलीं , गैर-बराबरी की खाई कम नहीं हुई और श्रम-शक्ति का पलायन यूँही जारी रहा तो ....  

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गौरतलब है कि प्रति व्यक्ति आय के मामले में बिहार देश के सबसे पिछड़े राज्य में शुमार है और कल ही जारी हुई आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट से ही जाहिर है कि पिछले दो सालों से बिहार के विकास दर में गिरावट दर्ज हो रही है और पिछले १० वर्षों में बिहार से २५० कारखाने दूसरे राज्यों में शिफ्ट हो गए .. नीतीश कुमार जी के पिछले 20 वर्षों के शासनकाल को बजट व् अर्थ - प्रबंधन के दृष्टिकोण से देखा जाए तो ये स्पष्ट होता है कि : राज्य के बजट के आकार और बजटीय योजनाओं के आकार में बड़ा अंतर होता है राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो पाता है  अधिकांश बड़ी केंद्रीय योजनाओं की राशि के लिए राज्य की ओर से प्रस्ताव तक नहीं भेजे जाते हैं  केंद्र से राशि मंगाने की चिंता नहीं होती है  और अगर राशि आ भी जाती है तो खर्च नहीं की जाती है  खर्च किया जाता तो लेखा - जोखा , हिसाब नहीं दिया जाता है।

हाल ही में सीएजी के द्वारा उजागर ७२ हजार करोड़ के मामले से ये बात सत्यापित भी होती है  लचर अर्थ - प्रबंधन , संस्थागत व् सत्ता संरक्षित भ्रष्टाचार से सरकार की कोई भी योजना , सरकार का कोई भी विभाग अछूता नहीं है  और इन तमाम पहलूओं को संदर्भ में रख कर देखा जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि " बिहार का बजट खोखली घोषणाओं से भरे  कागज के पुलिंदे से ज्यादा कुछ नहीं होता है " ... बिहार की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सबसे जरूरी बजटीय घोषणाओं व् प्रावधानों के यथोचित व् वास्तविक क्रियान्वयन की है ..

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