पटना में नीट की तैयारी कर रही एक छात्रा की संदिग्ध मौत ने सिर्फ अपराध की चर्चा नहीं बढ़ाई, बल्कि यह जांच प्रक्रिया और अधिकारियों की जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। घटना को दो महीने से अधिक समय हो गया, फिर भी मौत के कारण का स्पष्ट विवरण नहीं मिलना न्याय प्रक्रिया की गंभीरता पर छाया डालता है।पॉक्सो विशेष अदालत में बुधवार को शंभु गर्ल्स हॉस्टल के मकान मालिक मनीष रंजन की नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई हुई। बेऊर जेल में बंद मनीष रंजन को पहली बार अदालत में पेश किया गया। अदालत ने CBI से पूछा कि यदि SIT ने पूरी जांच और संबंधित कागजात सौंप दिए हैं, तो पिछले 20 दिनों से कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
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मनीष रंजन का बयान:
मनीष रंजन ने अदालत को स्पष्ट किया कि घटना के दिन वह घर पर थे। उन्होंने कहा कि 5 जनवरी को सुबह अपनी बेटी को लेकर पावापुरी मेडिकल कॉलेज गए और रात 8 बजे लौट आए। 6 जनवरी को सुबह 10 बजे ऑफिस गए और रात 8 बजे वापस लौटे। 7 जनवरी को सुबह 10 बजे हॉस्टल संचालिका नीलम अग्रवाल ने उन्हें घटना की जानकारी दी।
जांच अधिकारियों के बयान में मतभेद:
पहली जांच अधिकारी रोशनी कुमारी और SIT की एएसपी अनु कुमारी के बयानों में अंतर पाया गया।
एएसपी अनु कुमारी ने कहा कि 6 जनवरी को छात्रा के कमरे से दवा मिली थी, जिसे वापस उसी कमरे में रख दिया गया और 7 जनवरी को उठाया गया।
पीड़िता के पक्ष के वकील ने आरोप लगाया कि मनीष रंजन इस मामले का मुख्य जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि कुछ अधिकारियों और CBI की कार्रवाई मामले को दबाने जैसी प्रतीत होती है। अदालत में एक ऑडियो भी प्रस्तुत किया गया, जिसमें कथित धमकी के संकेत मिले। यह मामला अब सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया का नहीं, बल्कि जांच की निष्पक्षता और जवाबदेही का भी परीक्षण बन गया है। अगली सुनवाई में अदालत से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि मामले की दिशा और न्याय की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है।