पटना: बिहार में मकर संक्रांति सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि राजनीति का रंग भी लेकर आई है। दही-चूड़ा और तिलकुट के साथ ही नेता अपनी रणनीति और सत्ता के समीकरणों को आज परख रहे हैं। बिहार राज्य के कई नेता अपने आवास पर दही-चूड़ा भोज का आयोजन कर रहे हैं, जिसमें सियासी और पारिवारिक रिश्तों की झलक भी मिल रही है।
आज केंद्रीय और राज्य स्तर के कई नेता इस पर्व पर अपने-अपने कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं। मंत्री रत्ननेश सदा के आवास पर भी दही-चूड़ा भोज का आयोजन हुआ, जिसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शामिल होंगे। वहीं विपक्षी नेता तेजप्रताप यादव ने अपने आवास पर दही-चूड़ा, तिलकुट और लाहोरी जूस का आयोजन किया। इस भोज में उन्होंने लालू परिवार और सत्ता पक्ष के नेताओं को न्योता दिया। तेजप्रताप ने राबड़ी आवास जाकर लालू, राबड़ी देवी और छोटे भाई तेजस्वी यादव को भी आमंत्रित किया।
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हालांकि, इस बार राबड़ी आवास पर सन्नाटा पसरा हुआ है, और तेजस्वी यादव पूरी तरह शांत और चुप नजर आए। पिछले 6-7 महीनों से दोनों भाई आमने-सामने बातचीत नहीं कर रहे हैं, इसलिए तेजप्रताप के आयोजन पर तेजस्वी और उनके परिवार के शामिल होने की राजनीति में सबकी निगाहें हैं। इधर, चिराग पासवान ने भी अपने आवास पर दही-चूड़ा भोज आयोजित किया है, जिसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राज्यपाल और कई NDA नेताओं के शामिल होने की संभावना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तेजस्वी यादव इस समय चुप हैं और सरकार के कामकाज का निरीक्षण कर रहे हैं। उन्होंने साफ कहा कि वे अभी कुछ नहीं बोलेंगे और 100 दिन बाद अपनी प्रतिक्रिया देंगे। रामकृपाल यादव और BJP नेताओं के बयान पर भी तेजस्वी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।राजनीति जानकार मानते हैं कि तेजस्वी यादव अपने चुप्पी के माध्यम से सटीक समय आने पर सरकार की गलतियों पर निशाना साधेंगे और विपक्षी दल के नेता के रूप में अपना दायित्व भी निभाएंगे। उनका यह कदम पार्टी और व्यक्तिगत रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। मकर संक्रांति के त्योहार में यह राजनीतिक और पारिवारिक झलक यह दर्शाती है कि बिहार की राजनीति में उत्सव और सियासत हमेशा साथ-साथ चलते हैं। इस बार दही-चूड़ा भोज सिर्फ स्वाद का नहीं, बल्कि सियासी समीकरणों का भी प्रतीक बन गया है।
अब तेजस्वी यादव की चुप्पी के पीछे क्या रणनीति है ये तो आने वाला समय बताएगा। लेकिन ये बात तो सच है की ये राजनीति की दोस्ती और दुश्मनी का कुछ ठिकाना नही होता, कब कौन किसका दुश्मन ही जाये या फिर किसकी दुश्मनी कब किसको दोस्त बना जाए।