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अंटार्कटिका की बर्फ टूटी तो तटीय शहरों में तबाही, डूम्सडे ग्लेशियर बना दुनिया के लिए अलार्म

अंटार्कटिका का थ्वेट्स ग्लेशियर, जिसे वैज्ञानिक ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ कहते हैं, तेजी से कमजोर हो रहा है। अगर यह पिघला, तो समुद्र का स्तर कई फीट तक बढ़ सकता है और दुनिया के तटीय शहरों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है।

Antarctica's ice breaks, coastal cities devastated; Doomsday
अंटार्कटिका की बर्फ टूटी तो तटीय शहरों में तबाही, डूम्सडे ग्लेशियर दुनिया के लिए अलार्म- फोटो : फाइल फोटो

अंटार्कटिका में मौजूद थ्वेट्स ग्लेशियर आज पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी बन चुका है। वैज्ञानिक इसे ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ कहते हैं, और इसकी वजह साफ है। ताजा शोध और सैटेलाइट तस्वीरें बता रही हैं कि यह ग्लेशियर तेजी से कमजोर हो रहा है और टूटने की कगार पर है। अगर ऐसा हुआ, तो इसका असर पूरी दुनिया को झेलना पड़ेगा।थ्वेट्स ग्लेशियर का आकार अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य जितना बड़ा है।

यह सिर्फ एक ग्लेशियर नहीं, बल्कि पश्चिमी अंटार्कटिका की विशाल बर्फीली चादर को थामे हुए है। वैज्ञानिक इसे बोतल में लगे कॉर्क से तुलना करते हैं। मतलब, अगर यह कॉर्क निकला, तो पीछे की पूरी बर्फ बह सकती है और समुद्र का स्तर तेजी से बढ़ सकता है। रिसर्च के अनुसार, अगर केवल थ्वेट्स ग्लेशियर ही पूरी तरह पिघल गया, तो समुद्र का स्तर करीब 65 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है। यह अपने आप में ही खतरनाक है।

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 लेकिन अगर इसके साथ पूरी वेस्ट अंटार्कटिक आइस शीट भी प्रभावित हुई, तो समुद्र का स्तर 10 फीट तक बढ़ सकता है। इससे दुनिया के तटीय इलाकों में रहने वाले करोड़ों लोगों की जिंदगी पर सीधा असर पड़ेगा। सबसे बड़ी चिंता यह है कि ग्लेशियर के नीचे गर्म समुद्री पानी घुस रहा है। यह पानी बर्फ को अंदर से खोखला कर रहा है। ऊपर से, बीते 20 सालों में बर्फ की दरारें तेजी से बढ़ी हैं। इन दरारों की कुल लंबाई दोगुनी हो चुकी है। यह साफ संकेत है कि ग्लेशियर एक खतरनाक मोड़ की ओर बढ़ रहा है।

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अगर यह ग्लेशियर टूटा, तो इसका असर सिर्फ अंटार्कटिका तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के मुंबई और कोलकाता जैसे शहर, बांग्लादेश, मालदीव और न्यूयॉर्क जैसे तटीय इलाके गंभीर खतरे में आ जाएंगे। समुद्री बाढ़ और जमीन डूबने की घटनाएं आम हो सकती हैं। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि कार्बन उत्सर्जन को तुरंत कम करना बेहद जरूरी है। ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकना ही इस खतरे को टालने का एकमात्र रास्ता है। अगर अभी भी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।


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