बिहार की राजनीति में एक बार फिर शराबबंदी कानून को लेकर हलचल तेज हो गई है। केंद्र में एनडीए सरकार की वापसी के कुछ ही महीनों बाद राज्य के भीतर सहयोगी दलों के बीच मतभेद सामने आने लगे हैं। इस बार मुद्दा है बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी कानून, जिस पर अब समीक्षा की मांग जोर पकड़ रही है। इस बहस को हवा दी है जीतन राम मांझी ने, जो हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के संस्थापक और केंद्रीय मंत्री हैं। मांझी का कहना है कि शराबबंदी के कारण राज्य में आठ लाख से ज्यादा लोग कानूनी मामलों में फंसे हुए हैं, जिनमें बड़ी संख्या गरीब और वंचित वर्गों की है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस नीति से बिहार को भारी राजस्व नुकसान हो रहा है।
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गया में पत्रकारों से बातचीत के दौरान मांझी ने कहा कि शराबबंदी जमीन पर प्रभावी नहीं है। उनके शब्दों में, “शराबबंदी हो नहीं रही, बल्कि होम डिलीवरी हो रही है।” उन्होंने चिंता जताई कि अवैध और जहरीली शराब गरीबों तक आसानी से पहुंच रही है, जिससे उनकी सेहत और उम्र दोनों पर बुरा असर पड़ रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि नीति गलत नहीं है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में गंभीर खामियां हैं।
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मांझी से पहले उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने भी कानून की समीक्षा की मांग उठाई थी। पार्टी के एक विधायक ने सदन में कहा कि कानून बनने के बावजूद शराब आसानी से उपलब्ध है और राज्य को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। वहीं सत्तारूढ़ जेडीयू ने इन मांगों को खारिज कर दिया है। पार्टी का कहना है कि शराबबंदी कानून सर्वसम्मति से पारित हुआ था और इससे समाज में सकारात्मक बदलाव आए हैं, खासकर महिलाओं के जीवन में। अब सवाल यह है कि नीतीश कुमार अपने सहयोगियों की बढ़ती नाराजगी को कैसे संभालते हैं। क्या वे अपनी महत्वाकांक्षी शराबबंदी नीति में बदलाव के लिए तैयार होंगे, या फिर मौजूदा व्यवस्था के साथ आगे बढ़ेंगे—इस पर पूरे राज्य की नजरें टिकी हुई हैं।