बोकारो: प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती—इस कहावत को चरितार्थ किया है बोकारो के नन्हे कलाकार अथर्व भारद्वाज ने। चिन्मय विद्यालय (प्राथमिक शाखा) के छात्र अथर्व ने अपनी अदाकारी से अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत में पहचान बनाते हुए न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे झारखंड का नाम रोशन किया है। देवेंद्र सिन्हा के निर्देशन में बनी फिल्म “डिस्टेंट” इन दिनों विभिन्न अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में सराही जा रही है। इस फिल्म ने कंचनजंगा इंटरनेशनल फिल्म महोत्सव 2026 में द्वितीय सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पुरस्कार हासिल किया है। वहीं क्रिटिक्स सोसायटी फिल्म महोत्सव में यह फिल्म फाइनलिस्ट रही, जबकि अरावली एवं दरभंगा अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में इसका आधिकारिक चयन हुआ। इन उपलब्धियों ने फिल्म को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई है।
फिल्म में अथर्व भारद्वाज ने “नील” का किरदार निभाया है। उनकी मासूमियत, सहज अभिनय और भावनात्मक अभिव्यक्ति ने दर्शकों और समीक्षकों को खासा प्रभावित किया है। कम उम्र में इतनी परिपक्व अभिनय क्षमता उनके उज्ज्वल भविष्य की ओर इशारा करती है। अथर्व एक प्रतिष्ठित और संस्कारी परिवार से आते हैं। उनके दादा हरेंद्र चौबे समाजसेवी एवं शिक्षाविद हैं, जबकि उनके पिता रवि चौबे राजनीति और समाज सेवा में सक्रिय हैं और वर्तमान में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के जनरल सेक्रेटरी हैं। परिवार के संस्कार और सहयोग ने अथर्व को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है।
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अपनी सफलता पर खुशी जताते हुए अथर्व ने कहा कि यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं, बल्कि उनके विद्यालय, शिक्षकों, परिवार और बोकारो की जनता के सहयोग का परिणाम है। उन्होंने फिल्म के निर्देशक देवेंद्र सिन्हा और पूरी टीम का आभार भी व्यक्त किया। अथर्व की माँ अंकिता रश्मि के अनुसार, वह बचपन से ही मल्टीटैलेंटेड है और पढ़ाई के साथ-साथ अभिनय में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है। शूटिंग के दौरान भी उसने दोनों जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। वहीं उनके पिता रवि चौबे का कहना है कि सही माहौल और परिवार के सहयोग से बच्चों की प्रतिभा निखरती है। दादा हरेंद्र चौबे भी मानते हैं कि अथर्व में बचपन से ही अलग प्रतिभा रही है, जिसे परिवार ने हमेशा प्रोत्साहित किया। बोकारो जैसे औद्योगिक शहर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाले अथर्व भारद्वाज आज हजारों बच्चों के लिए प्रेरणा बन गए हैं। उनकी यह सफलता साबित करती है कि यदि संकल्प मजबूत हो और परिवार का साथ मिले, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।
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