पटना: वर्ष 2004 से 2009 के बीच बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे। इसी अवधि से जुड़े ‘लैंड फॉर जॉब’ यानी नौकरी के बदले जमीन मामले में अब कानूनी प्रक्रिया एक अहम मोड़ पर पहुंच गई है। दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट स्थित सीबीआई की विशेष अदालत ने इस मामले में लालू प्रसाद यादव राबड़ी देवी मीसा भारती , तेज प्रताप यादव, तेजस्वी यादव समेत कुल 41 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर दिए हैं। अदालत ने सभी आरोपियों पर प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 13(2) और 13(1)(d) के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी है। अदालत के इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति में जबरदस्त हलचल देखने को मिल रही है। सत्तारूढ़ दलों ने जहां इसे कानून की जीत बताया है, वहीं राष्ट्रीय जनता दल ने इसे राजनीतिक साजिश करार दिया है।
अदालत की टिप्पणी: ‘व्यापक साजिश के तहत हुआ खेल’
राउज़ एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला एक संगठित साजिश की ओर इशारा करता है। अदालत के अनुसार, लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार ने सरकारी नौकरियों को सौदेबाजी के साधन के रूप में इस्तेमाल कर अपने करीबी लोगों के नाम पर अचल संपत्तियां अर्जित कीं। न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह संदेह बनता है कि एक सुनियोजित तरीके से सरकारी पद का दुरुपयोग किया गया और परिवार को लाभ पहुंचाया गया।
बीजेपी का हमला: ‘जैसी करनी, वैसी भरनी’
कोर्ट के आदेश के बाद भारतीय जनता पार्टी ने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार पर तीखा हमला बोला। बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने कहा कि यह फैसला साबित करता है कि कानून से कोई ऊपर नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि रेल मंत्री रहते हुए गरीबों की जमीन लेकर नौकरी दी गई और आज उसी भ्रष्टाचार का हिसाब सामने आ रहा है। वहीं बीजेपी के दूसरे प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि अदालत के फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि राजनीति का इस्तेमाल अवैध संपत्ति जुटाने के लिए किया गया। उन्होंने लालू परिवार की संपत्तियों की देश और विदेश में जांच की मांग भी की और कहा कि आने वाले समय में दोषियों को सजा जरूर मिलेगी।
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जेडीयू की सख्त मांग: इस्तीफे और संपत्ति जब्ती की अपील
जनता दल यूनाइटेड ने भी इस फैसले के बाद लालू परिवार पर सीधा निशाना साधा। जेडीयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि अदालत की टिप्पणियों के बाद लालू प्रसाद यादव को आरजेडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव से भी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने-अपने संवैधानिक पदों से इस्तीफा देने की मांग की। साथ ही अदालत से यह भी आग्रह किया गया कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो अवैध संपत्तियों को जब्त कर उन्हें सामाजिक कार्यों—जैसे अनाथालय, विधवा आश्रम और छात्रावास—के लिए उपयोग में लाया जाए, ताकि राजनीति में एक सकारात्मक उदाहरण स्थापित हो सके।
आरजेडी का पलटवार: ‘जांच एजेंसियों का दुरुपयोग’
दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनता दल ने अदालत के फैसले को लेकर संयमित लेकिन स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है। आरजेडी के प्रदेश प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि राजनीतिक विरोधी चुनावी मैदान में मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए जांच एजेंसियों के जरिए दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आरोप तय होना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और पार्टी को अदालत पर पूरा भरोसा है। आरजेडी का कहना है कि सभी आरोपों का जवाब कानूनी तरीके से दिया जाएगा और अंततः सच्चाई सामने आएगी।
चार्ज फ्रेम होने का कानूनी अर्थ
कानून के जानकारों के मुताबिक, आरोप तय होने का मतलब यह नहीं है कि अभियुक्त दोषी साबित हो चुके हैं। इसका आशय केवल इतना है कि अदालत को प्रथम दृष्टया आरोपों में सुनवाई योग्य आधार नजर आया है। अब अभियोजन पक्ष को आरोप साबित करने होंगे और आरोपियों को अदालत के समक्ष अपनी बेगुनाही साबित करने का पूरा अवसर मिलेगा। इस मामले में अब लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के अन्य सदस्यों को नियमित ट्रायल का सामना करना होगा। अंतिम फैसला सबूतों और सुनवाई के आधार पर ही तय होगा।
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