बिहार की राजनीति एक बार फिर गर्माने लगी है। राज्यसभा चुनाव के बाद अब नजरें विधान परिषद् चुनाव पर टिक गई है, जहां सियासी समीकरण तेजी से बदलते दिख रहे हैं. सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने गणित को साधने में जुट गए हैं। खास बात यह है की इस बार महागठबंधन को नुक्सान और NDA को फायदा होने के साकेत मिल रहे हैं, जिससे चुनाव और दिलचस्प हो गया है।
सूत्रों के मुताबिक, नई सरकार के गठन के तुरंत बाद विधानसभा कोटे से विधान परिषद चुनाव की घोषणा हो सकती है। संभावना है कि अप्रैल के आखिरी सप्ताह या मई के पहले सप्ताह में चुनाव प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। इस बीच राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के चयन और समर्थन जुटाने में सक्रिय हो गए हैं।सबसे ज्यादा चर्चा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खाली हुई सीट को लेकर है। माना जा रहा है कि इस सीट पर उनके बेटे निशांत कुमार की एंट्री तय है, जो बिहार की राजनीति में एक नई पीढ़ी की शुरुआत का संकेत हो सकता है। वहीं, बीजेपी कोटे से मंगल पांडेय की सीट पर उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को भेजे जाने की चर्चा है।
अगर सीटों के संभावित बंटवारे की बात करें तो जदयू को 4, बीजेपी को 3, आरएलएम को 1 और राजद को 1 सीट मिल सकती है। इस गणित में महागठबंधन को नुकसान होता दिख रहा है, क्योंकि उसके पास पर्याप्त विधायक संख्या नहीं है कि वह अपनी सभी सीटें बचा सके। दरअसल, विधान परिषद चुनाव में जीत के लिए 25 विधायकों का समर्थन जरूरी होता है। मौजूदा स्थिति में महागठबंधन के पास करीब 41 विधायक हैं, जिससे वह मुश्किल से एक ही सीट सुरक्षित कर पाएगा। दूसरी ओर NDA के पास पर्याप्त संख्या है, जिससे वह न सिर्फ अपनी सीटें बचा सकता है, बल्कि अतिरिक्त सीटों पर भी कब्जा जमा सकता है।
यह भी पढ़ें : 6 अप्रैल का राशिफल : जानिये आज किस- किस राशि का भाग्य चमकने वाला है, और कौनसी राशियों को बरतनी है सावधानी।
इस चुनाव में एनडीए को कम से कम 2 सीटों का फायदा होता दिख रहा है। वहीं, चिराग पासवान की पार्टी LJP (रामविलास) भी पहली बार विधान परिषद में एंट्री की कोशिश में है। पार्टी के पास 19 विधायक हैं और उसे जीत के लिए 6 और विधायकों की जरूरत होगी। ऐसे में बीजेपी का समर्थन निर्णायक भूमिका निभा सकता है। दिलचस्प बात यह भी है कि इस बार कई दल नए चेहरों पर दांव लगाने की तैयारी में हैं। बीजेपी और जदयू दोनों ही पुराने चेहरों की जगह युवाओं और नए नेताओं को मौका दे सकते हैं। वहीं, राजद अपने कुछ अनुभवी नेताओं को दोबारा मौका देने की रणनीति पर काम कर रहा है। कुल मिलाकर, बिहार विधान परिषद चुनाव सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं बल्कि भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला मुकाबला बनने जा रहा है, जहां हर दल अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है।





