बिहार की राजनीति में एक बार फिर कांग्रेस के भीतर का टकराव खुलकर सामने आ गया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद के हालिया बयान और उनके एक्स पोस्ट ने पार्टी के अंदरूनी हालात पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शकील अहमद ने दावा किया है कि कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व के निर्देश पर बिहार कांग्रेस और युवा कांग्रेस उनके पटना और मधुबनी स्थित आवास पर पुतला दहन के बहाने हमला कर सकती है। अगर यह दावा सही है, तो यह न सिर्फ पार्टी अनुशासन बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के भी खिलाफ माना जाएगा।

शकील अहमद पहले से ही कांग्रेस नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी को लेकर अपने बयानों के कारण चर्चा में हैं। उन्होंने राहुल गांधी को “डरपोक और असुरक्षित नेता” बताया और यह आरोप लगाया कि कांग्रेस में मजबूत नेताओं को आगे बढ़ने नहीं दिया जाता। उनके मुताबिक, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सिर्फ नाम के अध्यक्ष हैं और असली फैसले राहुल गांधी ही लेते हैं। ऐसे बयान किसी भी पार्टी के लिए गंभीर चिंता का विषय होते हैं, क्योंकि इससे संगठन की एकजुटता कमजोर होती है।
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शकील अहमद ने राहुल गांधी के ‘संविधान बचाओ आंदोलन’ को भी बेअसर बताते हुए कहा कि इसका जमीनी स्तर पर कोई प्रभाव नहीं दिखा। उन्होंने यह भी कहा कि एसआईआर जैसे मुद्दों पर पार्टी की रणनीति विफल रही है और मुस्लिम समाज भी राहुल गांधी के कई आरोपों से सहमत नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उन्हें कांग्रेस से कोई शिकायत नहीं है और वे किसी अन्य पार्टी में जाने का इरादा नहीं रखते। उनकी नाराजगी सिर्फ राहुल गांधी से है।
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इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर असंतोष गहराता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ऐसे बयानों को संवाद के जरिए सुलझाएगी या फिर आंतरिक टकराव को खुली सड़कों तक पहुंचने देगी। बिहार जैसे अहम राज्य में, जहां कांग्रेस पहले से ही कमजोर स्थिति में है, इस तरह की बयानबाजी पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। अब देखना होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस चुनौती से कैसे निपटता है और क्या पार्टी के अंदर भरोसे और संवाद की राजनीति दोबारा स्थापित हो पाती है या नहीं।