मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान-इजरायल युद्ध के असर अब भारत के महानगरों तक साफ दिखने लगे हैं। LPG की आपूर्ति प्रभावित होने से दिल्ली, मुंबई, पुणे, सूरत और हैदराबाद जैसे शहरों में कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इसका सबसे बड़ा झटका प्रवासी मजदूरों को लगा है, जो अब बड़ी संख्या में अपने घर बिहार लौट रहे हैं। पटना के दानापुर, गया और मुजफ्फरपुर जैसे रेलवे स्टेशनों पर इन दिनों लौटते मजदूरों की भीड़ साफ नजर आ रही है। ट्रेनों में क्षमता से अधिक यात्री सफर कर रहे हैं। इन मजदूरों की कहानी सिर्फ पलायन की नहीं, बल्कि रोजी-रोटी छिन जाने की है।

पुणे से लौटे पूर्णिया के मजदूरों ने बताया कि वे निर्माण कार्य में लगे थे, लेकिन पिछले एक महीने से गैस की भारी किल्लत थी। हालात इतने खराब हो गए कि 15-20 दिनों तक लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाना पड़ा। युद्ध के बाद गैस की कीमतों में अचानक उछाल आया और जो गैस पहले 50-60 रुपये किलो मिलती थी, वह 300-400 रुपये तक पहुंच गई। हाल के दिनों में लकड़ी भी उपलब्ध नहीं हो सकी, जिससे भोजन का संकट गहराता गया।

इसी तरह कई मजदूरों ने आरोप लगाया कि कंपनियों ने काम बंद होने के बाद पूरी मजदूरी भी नहीं दी। कटिहार और मधुबनी के मजदूरों ने बताया कि गैस संकट के कारण फैक्ट्रियों में काम प्रभावित हुआ और उन्हें अचानक निकाल दिया गया। बिना पर्याप्त पैसे और भोजन के विकल्प के, उनके पास घर लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।

यह भी पढ़ें : रील बनाना बना काल ! एक टक्कर और खत्म हो गई जिंदगी

दिल्ली में छोटे उद्योग भी इस संकट से अछूते नहीं रहे। पूर्वी चंपारण के मजदूरों द्वारा संचालित एक सैंडल निर्माण इकाई को गैस की कमी के कारण बंद करना पड़ा। महंगी और ब्लैक में मिलने वाली गैस भी अब उपलब्ध नहीं हो रही, जिससे उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया है। स्थिति सिर्फ घरों तक सीमित नहीं है। गैस की कमी के कारण छोटे होटल और ढाबे भी बंद होने लगे हैं या महंगा भोजन परोसने को मजबूर हैं। इससे दिहाड़ी मजदूरों के लिए शहरों में रहना और काम करना और भी कठिन हो गया है।

यह भी पढ़ें : IPL 2026 का आज आगाज ! 10 पॉइंट्स में जानें IPL 2026 का पूरा खेल

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह संकट लंबे समय तक जारी रहा, तो शहरी अर्थव्यवस्था के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों पर भी दबाव बढ़ेगा, जहां लौटे मजदूरों के लिए रोजगार की चुनौती खड़ी हो जाएगी। फिलहाल, हजारों परिवार अनिश्चित भविष्य के बीच अपने गांवों में लौटकर नए सिरे से जीवन शुरू करने को मजबूर हैं।