पटना: भारतीय संस्कृति की शाश्वत धारा में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का विशेष स्थान है। वेदांत के आलोक में और भारतीय सनातन परंपरा के संवाहक के रूप में, मैं आचार्य संतोष, आज आप सभी के समक्ष अक्षय तृतीया (वर्ष 2026) के दिव्य महात्म्य और इसके आध्यात्मिक पक्ष पर प्रकाश डाल रहा हूँ। 'अक्षय' शब्द का अर्थ है- जिसका कभी क्षय न हो। भौतिक जगत में वस्तुएँ नाशवान हैं, परंतु यह तिथि हमें उस 'अमृत तत्व' की ओर ले जाती है जो अविनाशी है। वेदांत के अनुसार, आत्मा अक्षय है। अतः इस दिन किए गए दान, जप, तप और शुभ कर्मों का फल भी जीवात्मा के लिए अक्षय हो जाता है।

अक्षय तृतीया 2026: शुभ मुहूर्त और समय

वर्ष 2026 में अक्षय तृतीया का पर्व 19 अप्रैल, रविवार को मनाया जाएगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस दिन सूर्य और चंद्रमा अपनी उच्च राशियों में होते हैं, जो इसे एक 'अबूझ मुहूर्त' (स्वयंसिद्ध मुहूर्त) बनाता है।

  • तृतीया तिथि प्रारंभ: 19 अप्रैल 2026, प्रातः 10:52 बजे से।
  • तृतीया तिथि समाप्त: 20 अप्रैल 2026, प्रातः 07:30 बजे तक।
  • पूजन का श्रेष्ठ समय: 19 अप्रैल, सुबह 10:52 से सुबह 11:48 तक।
  • सोना/संपत्ति क्रय मुहूर्त: 19 अप्रैल सुबह 10:52 से अगले दिन 20 अप्रैल सुबह 05:53 तक (लगभग 19 घंटे)।

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पौराणिक शुरुआत और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

पौराणिक संदर्भों में यह तिथि सृष्टि के निर्णायक मोड़ों की साक्षी रही है। इसी पावन दिवस पर सतयुग और त्रेतायुग का सूत्रपात हुआ था, जिसे 'युगादि तिथि' कहा जाता है। भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी का प्राकट्य, माँ गंगा का धराधाम पर अवतरण और महाभारत काल में द्रौपदी को अक्षय पात्र की प्राप्ति-ये सभी घटनाएं इस तिथि की गरिमा को रेखांकित करती हैं। वेदांत साधक होने के नाते मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि अक्षय तृतीया पर किया गया दान और जप उसी अक्षय पात्र के समान हो जाता है, जो कभी रिक्त नहीं होता। सुदामा और श्रीकृष्ण का मिलन भी हमें यही सिखाता है कि जब भक्त श्रद्धा के 'तंदुल' ईश्वर को समर्पित करता है, तो उसे लौकिक और पारलौकिक दोनों ही संपदाओं की प्राप्ति होती है।

अक्षय तृतीया की पूजन विधि

जहाँ तक पूजन विधि और अनुशासन का प्रश्न है, इस दिन साधक को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदियों या घर पर ही गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कर भगवान लक्ष्मीनारायण की आराधना करनी चाहिए। भगवान विष्णु को तुलसी दल और ऋतु फल अर्पित करने के साथ-साथ पितरों के निमित्त तर्पण करना भी शास्त्र सम्मत है। दान की दृष्टि से यह समय ग्रीष्म ऋतु का होता है, अतः शीतल जल से भरे कलश, सत्तू, पंखा, छाता और जौ का दान आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। राशियों के अनुसार भी यह पर्व विशेष है; जहाँ मेष और सिंह राशि वालों के लिए यह दिन मान-सम्मान में वृद्धि लाएगा, वहीं वृषभ और तुला राशि के जातकों के लिए आर्थिक स्थिरता का योग बनेगा। कन्या और मकर राशि के साधकों के लिए स्वाध्याय और साधना अक्षय फल प्रदान करेगी।

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राशि विशेष: आपके लिए कैसा रहेगा यह पर्व?

  • वर्ष 2026 की अक्षय तृतीया कई शुभ योगों (जैसे गजकेसरी और अक्षय योग) के साथ आ रही है। 
  • मेष, सिंह, धनु के जातक गुड़ और लाल वस्त्र का दान करें जिससे आत्म-विश्वास में वृद्धि होगी। 
  • वृषभ, कन्या, मकर के जातक अगर सफेद चंदन और घी का दान करें तो यह आर्थिक स्थिरता के लिए विशेष फलदायी है। 
  • मिथुन, तुला, कुंभ के जातकों के लिए जल से भरे घड़े (कलश) का दान करने से बौद्धिक कार्यों में सफलता मिलेगी। 
  • कर्क, वृश्चिक, मीन के जातक अन्न और शीतल जल का दान करें इससे आध्यात्मिक प्रगति और शांति मिलेगी। 

क्या करें और क्या न करें

  • अक्षय तृतीया पर किया गया आचरण स्थायी प्रभाव डालता है, इसलिए सजग रहें:

क्या करें:

  • दान: गर्मी का समय होने के कारण जल, पंखा, छाता, जौ और सत्तू का दान सर्वोत्तम है।
  • नया आरंभ: कोई नया व्यापार, गृह प्रवेश या विद्यारंभ के लिए यह दिन सर्वश्रेष्ठ है।
  • साधना: मौन रहकर मंत्र जप करें, जिससे आंतरिक ऊर्जा का क्षय न हो।

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क्या न करें:

  • क्रोध और विवाद: घर में क्लेश करने से लक्ष्मी रुष्ट हो जाती है। अपनी वाणी को 'अक्षय मधुरता' प्रदान करें।
  • तामसिक भोजन: मांस, मदिरा और लहसुन-प्याज से परहेज करें।
  • अंधेरा न रखें: शाम के समय घर के मुख्य द्वार और पूजा स्थल पर दीपक अवश्य जलाएं।
  • ऋण (कर्ज): इस दिन न तो कर्ज लें और न ही दें, क्योंकि इसका प्रभाव लंबे समय तक रह सकता है।

अक्षय तृतीया के व्यावहारिक पक्ष पर ध्यान दें तो हमें 'क्या करें' से अधिक 'क्या न करें' पर सजग रहना चाहिए। चूँकि यह तिथि शुभता की प्रतीक है, अतः इस दिन क्रोध, असत्य भाषण और घर में कलह से बचना अनिवार्य है। स्वर्ण या संपत्ति खरीदना शुभ है, परंतु अहंकार और लोभ का संचय वर्जित है। यदि हम अपने भीतर की मलिनता का क्षय करने का संकल्प लें, तभी वास्तविक अक्षय पुण्य संभव है। अतः मेरा समस्त भारतीय संस्कृति के अनुरागियों को यही संदेश है कि इस महापर्व पर केवल बाह्य आडंबरों तक सीमित न रहें, बल्कि अपने चरित्र को भी इतना अक्षय और उज्ज्वल बनाएं कि वह समाज के लिए एक आदर्श बन सके।

प्रिय आत्मान! केवल स्वर्ण खरीदना ही अक्षय तृतीया नहीं है। वास्तविक स्वर्ण वह 'ज्ञान' है जो कभी नष्ट नहीं होता। यदि आप इस दिन एक सात्विक विचार बीज बोते हैं, तो वह आपके जीवन में अक्षय वटवृक्ष बनेगा। अपने भीतर के अहंकार का क्षय करें और परोपकार के अक्षय धन को संचित करें। भारतीय संस्कृति के गौरव को समझें, अपनी जड़ों से जुड़ें और इस अक्षय तृतीया पर संकल्प लें कि हम अपने चरित्र को भी 'अक्षय' और उज्ज्वल बनाएंगे।

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आचार्य संतोष, वेदांत साधक एवं भारतीय संस्कृति के प्रचारक, ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य, 9934324365

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